मोटी कमर, छोटी उमर

मोटी कमर, छोटी उमर

कमर शरीर का महत्त्वपूर्ण अंग मध्य भाग है जो हमारी सम्पूर्ण शारीरिक गतिविधियों के संचालन में मददगार होता है। यह कमर कई बातों का पैमाना व संकेतक भी है। पतली, बल खाती, लचकती, लोचदार व लहरदार कमर को कमनीय या सुंदर काया का मापदण्ड माना जाता है जबकि मोटी व फैली हुई कमर को कमर है या कमरा कहकर उपहास उड़ाया जाता है।
चिकित्सा जगत अधिक मोटी कमर को बीमारियों का संकेत मानता है। इसीलिए चिकित्सकों में 'जितनी मोटी कमर, उतनी छोटी उमर' कहावत प्रसिद्ध है। कमर कसना उद्यत होने, तैयार होने को कहते हैं। कमर टूटना, थक जाना, निराश होना, उत्साह का ठंडा हो जाना प्रकट करता है।
कमर सीधी करना थकावट को दूर करने के लिए लेट जाने को कहा जाता है। कमर में बल (दम) नहीं किसी के काम में कमजोर या असमर्थ होने पर कहा जाता है। लोचदार, बलखाती कमर वाली महिला को चलते देखकर बरबस सबकी नजरें ठहर जाती है। वैसे बढ़ती कमर अच्छे खानपान और आराम पसंद जिंदगी की चुगली करती है।
कमर झुका के नहीं, सिर उठा के चलें:- कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के कमर दर्द या शारीरिक अशक्तता की स्थिति में कमर झुका के चलता है। वैसे आयु की अधिकता के कारण लोग कमर झुका कर चलते हैं। यह स्वाभाविक व लंबी आयु के कारण रीढ़ व कमर की हड्डियों के कमजोर होने व घिस जाने के कारण होता है। कमर दर्द बच्चे, बड़ों सबको हो सकता हैं। यह अनेक कारणों से होता है किन्तु दर्द के कारण या लगातार कमर झुकाकर चलने पर आगे परेशानी बढ़ सकती है। कमर दर्द लापरवाहीपूर्वक अचानक झुकने, ज्यादा वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने, बैठने और सोने, व्यायाम न करने और पेट के बढऩे से हो सकता हैं।
यह बच्चों को भारी बस्ते या रेसिंग, साइकिल चलाने से, महिलाओं को ऊंची एड़ी के सैंडिल चप्पल के कारण एवं युवाओं को ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र में बाइक चलाने से होता है। यह जन्मजात विकृति, मासिक चक्र, पैरों में खामी, स्लिप डिस्क, साइटिका के कारण भी होता है। इनमें से अधिकतर दर्द कमर के व्यायाम, कमर सीधी कर पैदल चलने, श्रम करने, कुर्सी व स्टूल पर ज्यादा देर न बैठने पर धीरे-धीरे ठीक हो जाता है।
ये है कमर:- सभी के शरीर की बनावट उसके वंशानुगत अनुसार होती है किन्तु खानपान एवं आराम पसंद जिंदगी के चलते इसमें बदलाव होता है। शरीर का मध्य भाग कमर भी अन्य अंगों की ही तरह वंशानुगत, पूर्वजानुसार होता है किन्तु खानपान एवं आराम की अधिकता में यह कमर तेजी के साथ विस्तार पाती है।
जो हम दैनिक खाते हैं, वह खर्च होने से बच जाने पर जमा पूंजी की तरह शरीर में मांस, मज्जा, वसा बनकर जमा होने लगता है। यह क्रमश: पेट, कमर, जांघ के बाद शरीर के अन्य भागों में जमा होता जाता है। कमर का माप महिलाओं का 30 से 35 इंच के बीच होना चाहिए। यदि 35 से बढ़ जाए, तब सेहत पर खतरा बढ़ता जाता है। पुरूषों की कमर का माप 35 से 40 इंच के बीच होना चाहिये। यह यदि 40 से आगे बढ़ जाए, तब पुरूषों की सेहत पर मंडराने वाला खतरा बढ़ जाता है।
बढ़ती कमर के साथ बढ़ती बीमारी:-
यदि कमर का घेरा बढ़ रहा है तो मतलब है कि उसकी बीमारी भी बढ़ रही है। यह रक्तचाप को बढ़ाता है या अत्यन्त कम कर देता है। शुगर को बढ़ाता है। हृदयरोग की स्थिति पैदा करता है। हृदय को अधिक काम करना पड़ता है।
किडनी को भी ज्यादा काम करना पड़ता है। उस पर खतरा बढ़ता जाता है। लिवर और फेफड़े भी ज्यादा काम करने के कारण कमजोर होने लगते हैं। माइग्रेन का खतरा भी सामने आ सकता है। कब्ज, बवासीर व कमर दर्द की परेशानी हो सकती है। बीमारियां बढऩे से उम्र भी कम होती जाती है।
कमर को कैसे काबू करें:- जरूरत के अनुसार ही कम मात्र में संतुलित व सही भोजन करें। एक बारगी ज्यादा न खाएं। वसाधिक्य या ऊर्जा की अधिकता वाली चीजें न खाएं। फल-फूल, सब्जी, सलाद को महत्त्व दें। तली-भुनी चीजें, मांस, मछली, जंक फूड, फास्ट फूड, बोतल बंद चीजें, साफ्ट ड्रिंक्स त्याग दें। पैदल चलें, साइकिल चलाएं, व्यायाम करें। श्रम करें। पानी ज्यादा पिएं। नींबू पानी पिएं। वजन, मोटापा कम होने के बाद कमर का घेरा भी कम होता जाता है।
- सीतेश कुमार द्विवेदी

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