घर की खुशी होती है बेटी

एक जमाना था, जब घर में बेटी का जन्म होने पर पूरा परिवार निराश होता था और खुशियां नहीं मनाई जाती थीं। गरीब परिवारों में बेटी का जन्म होते ही उसके पिता के माथे पर चिन्ता की लकीरें दिखाई देने लगती थीं और पराई अमानत मानकर उसके हाथ पीले होने तक एक पिता अपने आपको भारी भरकम जिम्मेदारी के अहसास से दबा हुआ पाता था।
अब वैसा समय तो नहीं है मगर माहौल पूरी तरह अब बेटियों के पक्ष में भी नहीं है। पुत्र की अपेक्षा पुत्री का लालन-पालन सुविधाओं तथा स्वतन्त्रता के दायरों में ही है। वैचारिक स्वतन्त्रता के कारण व्यवहारिक पक्ष में अभी भी संशोधन अपेक्षित है लेकिन इतना सब होने के बावजूद घर में बेटी की उपस्थिति अनिवार्य समझी जाने लगी है। हमारी सामाजिक परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों का ताना बाना ही कुछ इस तरह बुना गया है कि इसमें स्त्री अथवा बहन-बेटी को समुचित स्थान और भागीदारी मिले। बेटियों के प्रति समाज में बदलाव भारत में मुगल साम्राज्य के बाद हुआ है। इन शासकों के राज में औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया जाता था, उस कारण त्रस्त समाज ने घर में बेटी के जन्म को अभिशाप की तरह झेला। जैसे - जैसे समाज आगे बढ़ता जा रहा है, बेटे बेटी में फर्क भी घटता जा रहा है। जैसा बेटा वैसी ही बेटी होनी चाहिए। अगर बेटा निहाल कर सकता है तो बेटियां भी कर सकती है। फिर अन्तर क्यों? समाज के कई वर्गों में दान-दहेज के बढ़ते प्रचलन ने बेटी को जन्म से ही अस्पृश्य बना दिया जो अब तक उग्र रूप में बरकरार रहा है।
-छगन मीणा

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