दांपत्य संबंधों हेतु घातक है क्रोध

दांपत्य संबंधों हेतु घातक है क्रोध

क्रोध दांपत्य संबंधों हेतु दीमक के समान है जो इसकी खुशियों व मधुरता को लग जाए तो दांपत्य संबंधों में प्रसन्नता की जगह तनाव, परेशानियां व कटुता घर कर जाती है जिसके कारण कई बार अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है।
पति-पत्नी दोनों में से किसी के भी अधिक क्रोधी होने पर स्थिति अत्यंत नाजुक हो जाती है। यदि एक क्रोध करता है तो दूसरा कुछ समय तक तो शांत रहता है मगर जब पहले का क्रोध सारी सीमाएं तोड़ देता है तो दूसरे को क्रोध आना भी स्वाभाविक है। फिर दोनों का अहम टकराता है व उनके मधुर संबंध पल भर में ही कटु संबंधों का रूप धारण कर लेते हैं।
कई बार पति के अत्यधिक क्रोधी होने का कारण स्वयं पत्नी होती है। एक ही गलती को बार-बार दोहराना, पति की कमियों को सबके सामने उजागर करना और बेवजह की फरमाइशें जिन्हें पूरा करने में पति सक्षम न हो, जैसी हरकतों पर पति को क्रोध आना स्वाभाविक है। समझदार पत्नियां तो स्थिति को पूर्णरूप से समझते हुए जल्द ही खुद पर नियंत्रण रख कर पति को क्रोधित होने से बचा लेती हैं परंतु कुछ पत्नियां ऐसी भी होती हैं जो ऐसा करना अपना अधिकार समझती हैं और अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आती। उन्हें अक्सर पति के गुस्से का शिकार होना पड़ता है।
इसी तरह यदि पत्नी को अधिक गुस्सा आता है तो इसका अर्थ है कि वह पति की कुछ ऐसी आदतों, जिन्हें वह लाख प्रयत्न के बाद भी सुधार नहीं पाई, के कारण पति से असंतुष्ट रहती है। उसके मन में एक टीस-सी उठती है कि काश पति ने उसकी भावनाओं को समझ लिया होता।
दांपत्य संबंधों को बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि पति व पत्नी दोनों को ही अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना चाहिए।
- यदि पति या पत्नी दोनों में से एक को क्रोध आए तो दूसरे को क्रोध कदापि नहीं करना चाहिए। दोनों क्रोध करने लगें तो छोटी-सी बात झगड़े का रूप धारण कर लेगी जो उचित नहीं है। अत: एक को क्रोध आने पर दूसरे का चुप रहना ही बेहतर है। फिर जब पहले का क्रोध शांत हो जाए तो प्रेमपूर्वक उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।
- एक-दूसरे की कमियों को लेकर मन में तनाव न पालें। परस्पर सहयोग से इन्हें दूर करना सीखें।
- क्रोध पर नियंत्रण पाने का सरल उपाय है कि एक को दूसरे पर क्रोध आ रहा हो तो दूसरे को वहां से हट जाना चाहिए। कोई प्रतिक्रिया करने पर क्रोधी व्यक्ति और भी भड़क जाते हैं, अत: इस बात का सदैव ध्यान रखें।
- जब इस तरह का माहौल पैदा हो जाए तो माहौल को सामान्य बनाने का प्रयास करें। घर छोड़कर जाने, आत्महत्या करने की धमकी कभी न दें।
- छोटी-मोटी बातों को नजरअंदाज कर देना ही बेहतर है। इन्हें सार्वजनिक न करें।
- दांपत्य संबंधों में अन्य लोगों की अधिक दखलअंदाजी न होने दें क्योंकि अन्य लोग आपके छोटे मोटे झगड़ों को भी अधिक तूल देते हैं जो आपके शांत स्वभाव में भी जीवनसाथी के प्रति क्रोध को उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होता है, अत: अपने झगड़ों का निपटारा स्वयं ही करें। मित्रों व रिश्तेदारों के समक्ष जीवनसाथी के गुस्सैल स्वभाव का रोना न रोयें।
- अगर स्थिति अधिक नाजुक हो जाए तो एकदम अलग हो जाने का निर्णय न लें। हो सकता है बाद में आपको पश्चाताप की आग में जलना पड़ें क्योंकि कई बार क्रोधवश जीवनसाथी के प्रति इतनी घृणा पैदा हो जाती है कि व्यक्ति यही सोचता है कि ऐसे नारकीय जीवन से तो अलग हो जाना ही अच्छा है। ऐसी स्थिति पैदा होने पर वरिष्ठ व्यक्ति या किसी मनोवैज्ञानिक से सलाह मशविरा अवश्य कर लें।
- एक-दूसरे की हर बात को महत्त्व दें। यदि पत्नी अधिक गुस्सैल है तो पति को चाहिए कि वह कारण जाने कि पत्नी उससे असंतुष्ट क्यों रहती है। अपनी सामथ्र्यनुसार पत्नी की ख्वाहिशों को पूरी करने की कोशिश करे। उसे महत्त्व दें ताकि वह कुंठाग्रस्त न हो। इसी तरह पत्नी का भी कर्तव्य है कि वह पति के गुस्से का कारण जानकर उसे दूर करने की कोशिश करे।
- पति-पत्नी दोनों को ही चाहिए कि वे क्रोध में अपना नियंत्रण इतना न खो दें कि उनके घरवालों को हस्तक्षेप करना पड़ें। बाद में उनको शर्मिंदगी तो होगी ही, साथ ही घरवालों के मन में उनके प्रति सम्मान कम होने की संभावना भी हो सकती है,अत: प्रत्येक स्थिति में सूझबूझ से काम लें।
-भाषणा बांसल

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