बचिये भावनात्मक शोषण से

बचिये भावनात्मक शोषण से

अक्सर जिन्हें हम प्यार करते हैं, अपना कहते हैं, वे ही समय-समय पर अपनी इच्छाओं, चाहतों की पूर्ति के लिए बड़ी तरकीब से हमारा भावनात्मक शोषण करते हैं और हमारी मजबूरी यह है कि हम होने देते हैं।
धीरे-धीरे बच्चे या ये अपने कहलाने वाले लोग अपनी इच्छित वस्तुएं इसी ढंग से पाने के आदी हो जाते हैं।
वे नई-नई युक्तियां सीख लेते हैं कि किस प्रकार मां या पिता पर भावनात्मक दबाव डाल कर अपनी मर्जी पूरी करवाई जा सकती है।
वैसे भी जीवन में प्राय: ऐसा होता है कि कभी किसी को जाने या अनजाने, गलती से ही, किसी की भी कोई भावनात्मक कमजोरी पता चल जाये और सामने वाला यदि 'समझदार-चालाकÓ हो, स्वार्थसिद्धि करना जानता हो तो इस जानकारी का लाभ उठा लेता है। वह इस भावनात्मक कमजोरी को भड़का कर हमारे ऊपर आंतरिक दबाव डाल कर अपना मतलब साध लेता है।
ऐसी किसी भी स्थिति में हम वस्तुस्थिति को तो अनदेखा कर देते हैं और तात्कालिक तौर पर सुनी जा रही तारीफ से प्रसन्न होकर तृप्त हो उस व्यक्ति को खुश करने में तत्पर हो जाते हैं, भले ही बाद में असलियत पता चलने पर अनुभव हो कि हम तो ठगे गये।
स्वयं को भावनात्मक शोषण से यथासंभव बचाये रखने के लिए अपनी ही कमजोरियों पर ध्यान देना तथा उन्हें दूर करना जरूरी है। यदि हम में कोई कमजोरी होगी तो लोग तो उसका फायदा उठायेंगे ही।
अक्सर ऐसे लोग जिनमें आत्मविश्वास की कमी होती है, संकल्प-विकल्प में घिरे रहते हैं। वे अपनी बात या निर्णय पर टिकना नहीं जानते। वे प्राय: संघर्ष से बचाव के लिए किसी की बात मान लेते हैं। फिर उस पर भी टिके रहें, यह वे कर नहीं पाते हैं और ढुलमुल प्रकृति के कारण समय व श्रम बर्बाद करते हैं और मूर्ख भी कहलाते हैं।
अपनी कमजोरी ही हमारा भावनात्मक शोषण कराती है, अत: सबसे पहले जरूरी यह है कि खुद को टटोल कर अपनी कमजोरियां खोजी जायें व उन्हें दूर किया जाये। यह कमजोरियां उन्हीें स्थितियों से मिलेेंगी जब हमें अपने ठगे जाने का मलाल सालता है। अपनी भावनाओं को उभारने वाले कौन से लोग हैं तथा उन्होंने हमारी भावनात्मकता को उभारने के लिए क्या व्यवहार किया था, को पहचान लेने पर फिर व्यक्ति भविष्य में सावधान हो जाता है और एक बार समझ जाने पर फिर उसे शोषित हो जाने का मलाल हो, ऐसा अवसर उपस्थित नहीं होता।
इस तरह अपना गलत लाभ उठाने वालों को शिकस्त देकर व्यक्ति सुनियंत्रित ढंग से काम कर सकेगा, स्वयं को अपराध बोध से बचाये रखेगा और अपना आत्मविश्वास भी बनाये रखेगा। अब लोग आपका आदर-मान करने लगेंगे। अपनी भावनात्मक दुर्बलताओं को भूल कर व्यक्ति अपने लिए मान व आदर की नई भूमिका तैयार कर पाता है और सुख से जीता है।
-पूनम दिनकर

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