बच्चों की परवरिश: कल्पनाओं को यथार्थ का रूप दे सकते हैं माता-पिता

बच्चों की परवरिश: कल्पनाओं को यथार्थ का रूप दे सकते हैं माता-पिता

आज अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की शरारतों व जिद से परेशान हैं। छोटी उम्र में तो इन शरारतों को बच्चे का बचपना माना जाता है परन्तु 8-9 वर्ष तक आते-जाते ये शरारतें माता-पिता के लिए सिरदर्द बन जाती हैं। फिर शुरू होता है बच्चे को कोसना, मारना, परन्तु यह सब इस समस्या का हल नहीं।
बच्चों की शरारतों व जिद्दी होने के पीछे काफी हद तक माता-पिता का ही हाथ होता है। पहले तो वे बच्चे को ब्लैकमेल करना सिखाते है, जैसे 'बेटा अगर तुम यह करोगे तो हम तुम्हें चाकलेट देंगे' और जब बच्चा कहता है कि 'यह काम मैं तब करूंगा जब आप मुझे कैरम ले कर दोगे' तब बच्चे का यह जवाब माता-पिता को नागवार गुजरता है।
यही नहीं, माता-पिता का अधिक लाड प्यार या बहुत अधिक मार भी बच्चे को जिद्दी व उद्दण्ड बना देती है। सबसे अधिक जिम्मेदार है आज का माहौल।
बच्चों पर इतना अधिक पढ़ाई का बोझ बच्चों की दिमागी क्षमता को बढ़ा नहीं रहा बल्कि उन्हें किताबी कीड़ा बना रहा है। माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे कम्प्यूटर बन जाएं परन्तु हर बच्चे की दिमागी क्षमता भिन्न होती है।
माता-पिता को यह समझना चाहिए कि हर बच्चा आइस्टाइन नहीं बन सकता। अपने बच्चे की दूसरों के बच्चों से तुलना करने से बेहतर है कि वे बच्चे की भावनात्मक जरूरतें समझें। शिक्षा भी धीरे-धीरे एडवांस होती जा रही है जिससे बच्चों पर नए विषयों का भी बोझ पड़ रहा है। आज बच्चे परिपक्व हो चुके हैं ।
पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव भी बच्चों को भारतीय सभ्यता से दूर ले जा रहा है। विदेशों की भांति भारत में भी रोज डे, वैलेन्टाइन डे और न जाने कितने डेज को मनाने का प्रचलन चल पड़ा है। आज 9-10 साल के बच्चों के ब्वॉय फ्रेंडस, गर्ल फ्रेंडस हैं। हमारे भारतीय समाज में ब्वॉय फ्रेंडस होना भी गलत माना जाता है और गर्ल फ्रेंडस होना भी क्योंकि भारतीय इस रिश्ते में छुपी अच्छी भावना को नहीं देख पाते। वे इसे दोस्ती का रिश्ता नहीं मानते इसलिए बच्चे छुप-छुप कर मिलते हैं और छुप कर मिलना किसी भी तरह से दोस्ती नहीं मानी जा सकती।
ऐसे माहौल में बच्चों का सही विकास किस तरह संभव है? ऐसे माहौल में सिर्फ माता-पिता का फर्ज बहुत अधिक बढ़ जाता है क्योंकि बच्चे की नींव परिवार से ही प्रारम्भ होती है और माता-पिता के लिए सबसे अधिक आवश्यक है बच्चे को सही परिवेश देना, समझ देना, प्यार देना ताकि बच्चा सही राह चुनने में समर्थ हो सके।
शिक्षा हर किसी के लिए आवश्यक है परन्तु इसे बच्चों पर थोपें नहीं। बच्चों पर पढ़ाई का अनावश्यक बोझ नहीं लादें। बच्चे के मानसिक विकास के लिए जितना पढऩा जरूरी है, उतना ही शारीरिक विकास के लिए उनका खेलना, इसलिए उन्हें खेलने के लिए भी समय दें। बच्चों की जरूरतों को समझें, उन्हें पूरा भी करें पर वही जरूरतें जो उनकी उम्र व जरूरत के हिसाब से ठीक हों।
मार किसी भी समस्या का इलाज नहीं क्योंकि कभी-कभी मार खाते-खाते वे इतने उद्दण्ड बन सकते हैं कि आप पर भी हाथ उठा दें। अगर उनसे कोई गलती हो गई हो तो उन्हें इस प्रकार समझाएं कि वे उस गलती को स्वयं महसूस करें और दुबारा उसे न दोहराएं। उचित आयु आने पर उन्हें सेक्स का ज्ञान दें क्योंकि इस बारे में जो शिक्षा उन्हें बाहर से प्राप्त होगी, वह आधी अधूरी होगी और आधा ज्ञान बच्चे को दिशा से भटका सकता है।
प्रारंभ से ही बच्चों में रचनात्मक कार्यों के प्रति रूचि जगाएं। उन्हें प्रारंभ से ही जिम्मेदार बनाएं ताकि वे गैर जिम्मदेार न बनें और हर काम के लिए आप पर आश्रित न हों। जो माता-पिता नौकरी पेशा हैं उन्हें बच्चों की देखभाल पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है क्योंकि बच्चा उनके पीछे क्या करता है, उसके बारे में उन्हें ज्ञान नहीं होता।
साथ ही बच्चा अकेलापन भी महसूस कर सकता है इसलिए ध्यान रखें कि आप बच्चे को जितना भी समय दे रहे हैं उसमें आपको अपने पूरे दिन की कमी को भी पूरा करना है।
बच्चे को टी. वी. देखने से मना न करें परन्तु एक समय निश्चित कर दें और उसकी उम्र के अनुसार ही प्रोग्राम देखने दें जैसे कार्टून, क्विज आदि। आजकल कम्प्यूटर भी टी. वी. की तरह आम हो गया है और बच्चे इंटरनेट पर कुछ गलत भी देख सकते हैं इसलिए बच्चे द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कम्प्यूटर पर विशेष ध्यान दें।
- सोनी मल्होत्रा

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