महिलाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति

महिलाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति

नशेडिय़ों को दूर से देखकर भाग जाने वाली या उनसे नफरत करने वाली महिलाएं भी अब नशे की आदी होती जा रही हैं। एक अध्ययन के मुताबिक देश में नशा करने वाली महिलाओं की संख्या 8.9 फीसदी है। देश के नौ शहरों में 2831 नशा लेने वालों में 251 महिलाएं पायी गयीं।
इस मामले में अब तक आम धारणा थी कि अशिक्षित और निचले तबके की महिलाएं ही बीड़ी या तंबाकू जैसी नशीली चीजों की आदी हैं, लेकिन अध्ययन ने स्पष्ट रूप से यह दर्शाया है कि आज ड्रग्स की आदी अधिकतर युवा और शिक्षित महिलाएं होती हैं।
समाज की जागृत महिलाएं पुरूषों की नशे की लत छुड़ाने के पीछे पड़ी रहती आ रही हैं। इसके एवज में उन्हें पुरूषों के गुस्से से लेकर शारीरिक यंत्रणा तक का शिकार होना पड़ता है। अब जब वे खुद इसे अपना रही हैं तो नशे के सेवन से जो तकलीफ होती है, वह तो अपनी जगह है ही, उन्हें सामाजिक और पारिवारिक यातनाएं भी सहनी पड़ती हैं।
सवाल उठता है कि नशे की आदी महिलाओं को जि़दगी में किन-किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है? अव्वल तो हाई-फाई सोसायटी की ये महिलाएं किसी नतीजे की परवाह ही नहीं करतीं क्योंकि ऐसे समाज में बाहर घूमने वाली या पार्टियों में शामिल महिलाओं में ज्यादातर किसी न किसी नशे का सेवन करती हैं और इसी में अपनी शान समझती हैं।
इसका असर उनके बच्चों पर जरूर पड़ता है और कम उम्र से ही वे नशे की ओर झुक जाते हैं। यही कारण है कि आज ऐसे समाज के बच्चे अपने आपको अकेला महसूस करते हैं और कई तो सामाजिक अपराधी तक बन जाते हैं।
नशे की वजह से जिन महिलाओं को ज्यादा दुख भोगना पड़ता है उनमें मध्यम वर्ग की वे महिलाएं होती हैं जो अपनी गलत सोच और हैसियत से ऊंची छलांग लगाने के कारण दुर्भाग्यवश नशे की लत लगा बैठती हैं। वे न घर की रहती हैं न घाट की। न तो उनका सपना पूरा होता है, न ही वे घर-परिवार की रह पाती हैं।
जहां तक छोटे तबकों की महिलाओं की बात है, उन पर कोई ज्यादा असर नहीं पड़ता, चूंकि उनका समाज, परिवार अरसे से यह देखने का आदी हो चुका है।
आमतौर पर नशे की आदी महिलाएं अनिद्रा, अनियमित मासिक स्राव और डिप्रेशन की शिकार हो जाती हैं।
कई बार तो गर्भवती महिलाओं के गर्भ ही नहीं ठहरता और अगर बच्चा होता भी है तो वह शारीरिक या मानसिक रूप से अपंग होता है।
महिलाओं में नशे की बढ़ती आदत का सबसे बड़ा कारण माना गया है समाज और परिवार का बिखराव और लोगों का आत्मकेंद्रित होना। लोग आज इतने आत्मकेंद्रित हो गये हैं कि वे न तो दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं न उनके दुख-दर्द को।
यही वजह है कि सब एक-दूसरे से कटते जा रहे हैं। समाज टूट रहा है, परिवार बिखर रहा है। अगर कोई किसी से जुड़ता भी है तो महज निहित स्वार्थ के कारण। ऐसे में कोमल भावनाओं की मलिका अपने गमों से छुटकारा पाने के लिए भी नशे की ओर उन्मुख होती हैं।
- कर्मवीर अनुरागी

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