चुस्ती-स्फूर्तिदायक एवं उपचारक है चाय

चुस्ती-स्फूर्तिदायक एवं उपचारक है चाय

चाय पारंपरिक भारतीय पेय नहीं है, फिर भी इस समय भारत में यह एक अत्यंत लोकप्रिय पेय है। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी न केवल चाय की चुस्कियाँ लेना पसंद करते हैं अपितु प्राय: सभी चाय बनाना भी जानते हैं। चाय बनाने के अनेक तरीक़े हैं और कई प्रकार से इसे तैयार किया जाता है। हमारे देश में विशेष रूप से उत्तरी भारत में चाय प्राय: दूध डाल कर तैयार की जाती है। यूरोपीय देशों, रूस और अमेरिका के लोग प्राय: बिना दूध की चाय पसंद करते हैं। तिब्बत की नमकीन चाय का तो स्वाद ही नहीं, बनाने की विधि भी रोचक है।
चाय आप जिस विधि से भी तैयार करें, चाहे वह दूध के बिना हो या दूध के साथ, मीठी हो या फीकी, काली हो या सफेद, नींबू वाली चाय (लेमन टी) हो अथवा तुलसी की पत्तियों वाली चाय, हर प्रकार की चाय में एक चीज़ अवश्य डाली जाती है और वो है चाय की पत्तियाँ अथवा टी लीव्ज़। चाय की पत्ती विशुद्ध रूप से एक वनस्पति है। इसे हर्बल पेय की श्रेणी में रखा जा सकता है।
कुछ लोग चाय को बहुत पसंद करते हैं लेकिन कुछ लोग इसे न केवल घातक पेय मानते हैं अपितु चाय को भारतीय संस्कृति के खि़लाफ़ भी मानते हैं। क्या चाय वास्तव में भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल और घातक है? हमारे यहाँ वैदिक काल से ही विभिन्न रोगों के उपचार के लिए क्वाथ या काढ़ा बना कर पीने का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद में विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों अथवा वनस्पतिजन्य पदार्थों से क्वाथ बनाने का वर्णन मिलता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति में जोशांदा भी विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों को उबालकर ही बनाया जाता है।
काली मिर्च, लौंग, बड़ी और छोटी इलायची, सौंठ या अदरक, पीपल, मुलेहठी, उन्नाब, बनफ्शा आदि विभिन्न जड़ी-बूटियों और मसालों को उबालकर काढ़ा बनाने का प्रचलन आज भी हमारे यहाँ ख़ूब प्रचलित है। सर्दी-ज़ुकाम में के उपचार के लिए तो इससे उपयोगी औषधि हो ही नहीं सकती। इसी प्रकार चाय में भी अनेक औषधीय गुण विद्यमान हैं जो शरीर को चुस्ती-स्फूर्ति देने के साथ-साथ अनेक प्रकार के रोगों को रोकने अथवा उनका उपचार करने में सक्षम हैं।
जब भी चाय के गुणों अथवा अवगुणों की बात होती है तो चाय में उपस्थित तत्व कैफीन की चर्चा भी अवश्य होती है। चाय में कैफीन के अतिरिक्त और भी एक ऐसा तत्व उपस्थित होता है जो केवल लाभदायक है और वह है थियानिन। मस्तिष्क और शरीर को शांत रखने और तनाव को कम करने में इस अमीनो एसिड की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चलता है कि थियानिन न केवल तनाव को कम कर शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार होता है अपितु मानसिक सतर्कता और एकाग्रता के विकास में भी सहायक होता है।
जब हम ध्यान अथवा मेडिटेशन की अवस्था में होते हैं तो उस समय हमारे मस्तिष्क से जो तरंगें निकलती हैं उन्हें अल्फा तरंगें कहते हैं और उस अवस्था को 'अल्फा स्टेट ऑफ माइंड'। इस अवस्था में शरीर में स्थित विभिन्न अंत:स्रावी ग्रंथियों से लाभदायक हार्मोंस का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जो व्यक्ति को तनावमुक्त कर उसे रोगों से बचाता है तथा रोग होने पर शीघ्र रोगमुक्ति प्रदान करने में सहायक होता है। चाय में उपस्थित थियानिन मस्तिष्क को उसी अवस्था में ले जाने में सक्षम है अत: चाय की प्याली ध्यानावस्था का ही पर्याय है।
चाय का सेवन हमारी याददाश्त को चुस्त-दुरुस्त रखने में भी सहायक होता है। अगर शरीर में पॉलीफिनॉल्स की पर्याप्त मात्र हो तो इससे याददाश्त की कमी का ख़तरा कम हो जाता है। ताज़ा अनुसंधानों से ये बात स्पष्ट होती है कि फल, चाय, कॉफी आदि पेय पदार्थ शरीर में पॉलीफिनॉल्स के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इस प्रकार चाय हमारी याददाश्त को चुस्त-दुरुस्त रखने में भी सहायक होती है।
- दिनभर में तीन-चार कप चाय पीजिए और हृदय रोगों, स्ट्रोक, त्वचा रोगों तथा कैंसर जैसे रोगों को दूर भगाइए।
- प्रतिदिन तीन-चार कप चाय पीने से हृदय विकारों की संभावना दस प्रतिशत से भी ज़्यादा कम हो जाती है।
- चाय में उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट हमारी रोगों से लडऩे की क्षमता में वृद्धि कर हमें निरोग बनाए रखने में सक्षम होते हैं तथा रोग की दशा में शीघ्र रोगमुक्ति में सहायक होते हैं।
- चाय में उपस्थित तैलीय तत्व हमारे पाचन में भी सहायक होते हैं।
- चाय डिहाइड्रेशन दूर करने, दाँतों को मजबूत बनाने तथा कोलेस्ट्रॉल को राकने में भी सक्षम है।
- चाय में मौजूद कैफीन नामक तत्व सरदर्द से मुक्ति प्रदान कर हमें प्रफुल्ल तथा स्वस्थ बनाता है।
- चाय में उपस्थित थियानिन नामक अमीनो एसिड मानसिक सतर्कता और एकाग्रता के विकास में भी सहायक होता है।
- एक प्याली चाय व्यक्ति को ध्यान अथवा मेडिटेशन की अवस्था में पहुँचाने के लिए भी पूर्ण रूप से सक्षम है।
- ग्रीन टी तथा बिना दूध की काली चाय अथवा ब्लैक टी से वजऩ कम करने और मोटापा रोकने में भी सहायता मिलती है।
कुछ लोग चाय भी पीते हैं और यह भी मानते हैं कि चाय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ऐसे में उनकी मानसिक अवस्था क्या होगी, इसका अंदाज़ा लगाइए। वे चाय का त्याग नहीं कर पाते और सदैव ऐसी भावना से ग्रस्त रहते हैं जैसे वे कोई ग़लत कार्य कर रहे हों। हाँ चाय से नहीं, चाय विषयक घातक भावनाओं से ज़रूर वे प्रभावित होते हैं और एक प्रकार के अपराध बोध से त्रस्त भी जो पूर्णत: काल्पनिक है अत: निद्र्वंद्व होकर चाय का सेवन कीजिए और स्वस्थ रहिए।
- सीताराम गुप्ता

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