प्रसव के बाद भी स्वस्थ रहें

प्रसव के बाद भी स्वस्थ रहें

आमतौर पर लड़की के गर्भ धारण करते ही पूरे परिवार में खुशी छा जाती है। परिवार के लोग नवजात शिशु के बारे में तरह तरह की कल्पनाएं करने लगते हैं। कभी उनके मन में आनन्द की लहरें हिलोरने लगती है तो कभी किसी अनिष्ट की आशंका से उनका मन उदास हो जाता है। वे गर्भस्थ शिशु के सकुशल जन्म के लिए नौ महीने एड़ी चोटी एक करके हर संभव प्रयास करती है।
प्रसव के बाद मां नवजात शिशु का ध्यान तो रखती है लेकिन अपने लिए समय नहीं निकाल पाती। इसका परिणाम यह होता है कि नव प्रसूता तथा शिशु को अनेक रोग पकड़ लेते हैं जो जीवन भर कष्ट देते रहते हैं।
इस संबंध में यदि थोड़ी सी सावधानी बरती जाये तथा कुछ संयम किए जाएं तो बड़ी आसानी से इन मुसीबतों से बचा जा सकता है।
सर्वप्रथम प्रसव के बाद स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। अक्सर महिलाएं प्रसव के बाद साफ सफाई की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाती जिसके बहुत बुरे परिणाम हो सकते हैं। स्वच्छता मां के लिए ही नहीं पैदा होने वाले शिशु के लिए भी जरूरी है। मां अगर अपनी साफ सफाई का ध्यान नहीं रखती तो उसे योनिद्वार गर्भाशय की अनेक बीमारियां होने की आशंका रहती है।
प्रसूता स्त्री को गंदगी से होने वाली प्रमुख बीमारियां हैं-बदबूदार पानी जाना, कमर में दर्द, पीठ में दर्द, सिर में दर्द, पेट में दर्द, जोड़ों में दर्द, आदि। इनके अतिरिक्त बालों का झडऩा, त्वचा का रूखा हो जाना, चेहरे पर झाँई हो जाना, मांसपेशियों में खिचाव होना, आंख तथा दांत का कमजोर हो जाना, बालों में रूखापन आ जाना आदि की शिकायतें भी हो सकती हों।
वास्तव में इन परेशानियों से बचना कोई कठिन काम नहीं है। इसके लिए मां को प्रतिदिन अच्छी तरह से नहाना चाहिए तथा साफ सुथरे कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए। मूत्र विसर्जन के बाद पानी में एन्टीसेप्टिक दवाएं डालकर उससे अपने गुप्त अंगों की सफाई करनी चाहिए। इस काम में तनिक भी लापरवाही खतरे से खाली नहीं है क्योंकि ऐसा न करने से कीटाणुओं का संक्रमण हो सकता है और ल्यूकोरिया जैसी भयानक बीमारी हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।
इसके अलावा स्तनों की सफाई पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। बच्चे को स्तनपान कराना भी बहुत जरूरी है क्योंकि स्तनपान न कराने से स्तनों में दूध जम जाता है और वहां गांठ सी बन जाती है। इसमें प्रारंभ में हल्का हल्का दर्द होता है तथा बाद में यही गांठ फोड़े का रूप धारण कर लेती है। कभी कभी स्तन कैंसर भी हो सकता है। अत: बच्चे को अधिक से अधिक स्तनपान कराने की कोशिश करनी चाहिए।
शुरू शुरू में बच्चे को निपिल चूसना सिखाना पड़ता है। यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है कि अगर मां संतुलित भोजन लेती रहे तो बच्चा जितना ज्यादा दूध चूसेगा, उतना ही ज्यादा मां का दूध बनेगा। मां का दूध बच्चे के लिए बहुत लाभदायक होता है। शुरू के तीन दिनों में जो दूध उतरता है वह बच्चे को कई तरह की बीमारियों से बचाता है।
मां अगर स्वच्छता का ध्यान नहीं रखेगी तो उसका असर बच्चे पर भी पड़ेगा जैसे बाहर से आकर तुरन्त बिना स्तन पोंछे दूध पिलाने पर बच्चा मां के स्तनों में लगा पसीना, धूल सभी कुछ चूस लेगा जो बच्चे के लिए हानिकारक है।
प्रसूता के रहने का कमरा एकदम बन्द करके रखे जाने की धारणा भी गलत है तथा हानिकारक भी है। इससे जच्चा-बच्चा दोनों को जान का खतरा भी हो सकता है। जिस स्थान में जच्चा-बच्चा रहते हों, वहां खुली हवा तथा प्रकाश आदि का प्रबंध होना चाहिए। खुली हवा तथा खुली धूप जच्चा बच्चा दोनों के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। इससे अनेक शरीर में बीमारियां नहीं पनपने पाती।
हमारे यहां अजवाइन व लौंग का पानी या फिर सादा उबला हुआ पानी प्रसूता को देने का काफी पुराना रिवाज है। यह पानी शुद्धता की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी होता है। इस पानी में पीलिया जैसे रोगों से बचाने की ताकत होती है। इसके अलावा जच्चा बच्चा के कमरे में धूनी रमाने का भी काफी पुराना किन्तु बहुत सार्थक नुस्खा है। इस धुएं में कुछ ऐसे रोगाणुनाशक तत्व होते हैं जो वातावरण को स्वच्छ कर देते हैं तथा मां और बच्चे दोनों को अनेक रोगों से बचाते हैं।
स्वच्छता के बाद संतुलित आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रसव के समय तथा प्रसव के बाद जच्चा बच्चा दोनों को कैल्शियम की बहुत जरूरत होती है। यदि कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में मिलता रहता है तो कमर में दर्द, सिर दर्द, दांत कमजोर होना आदि की शिकायत नहीं होती। नवजात शिशु को भी कैल्शियम की बहुत ज्यादा जरूरत होती है, इसके अलावा प्रोटीन, विटामिन व आयरन भी बहुत आवश्यक होते हैं। ये सभी तत्व बच्चे को अपनी मां के दूध से ही प्राप्त होते हैं।
यहां ध्यान देने की बात यह है कि मां के दूध में ये सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में तभी होंगे, जब मां को इनकी पर्याप्त मात्रा मिलेगी। इसलिए मां को ज्यादा से ज्यादा मात्र में हरी सब्जियां, दाल, अंकुरित दाल, चावल, पनीर, दूध, दही, मौसमी फल, अण्डा, मीट, सलाद आदि चीजें खाना चाहिए।
मां को हमेशा हल्का और सुपाच्य भोजन ही करना चाहिए। गरिष्ठ भोजन करने से कब्ज की शिकायत हो जाती है तथा जोर पकडऩे पर बच्चेदानी बाहर भी निकल सकती है, इसलिए गरिष्ठ तथा तले हुए पदार्थ कम मात्रा में लेने चाहिए। प्रसव के बाद वजनी वस्तुएं नहीं उठानी चाहिए और न ही उस ज्यादा मेहनत का कोई काम करना चाहिए।
जब बच्चा पेट में होता है तो मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं। सामान्य अवस्था में बच्चेदानी के अपनी पूर्व अवस्था में आने में छह या सात सप्ताह लगते हैं, अत: इस दरम्यान यदि प्रसूता बहुत ज्यादा झुकती है या वजन उठाती है या कोई अन्य मेहनत का कार्य करती है तो उसकी बच्चेदानी अपनी जगह से हट जाने की आशंका रहती है। इसके अतिरिक्त पीठ और कमर में दर्द की संभावना भी रहती है। प्रसूता को हमेशा किसी तख्त या कसी हुई खाट पर ही सोना चाहिए। ढीली खाट या ऊंचे नीचे स्थान पर सोने से कमर में दर्द होने लगता है जो सारी उम्र पीछा नहीं छोड़ता।
वास्तव में महिलाओं की थोड़ी सी लापरवाही के कारण उनका सारा जीवन कष्टमय हो जाता है। यदि प्रसव के बाद थोड़ी सी सावधानी बरतें तथा कुछ संयम करें तो वे अनेक रोगों से बच सकती हैं।
- गजेन्द्र सिंह

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