नकारात्मक भावनाएं भी देती हैं रोगों को आमंत्रण

नकारात्मक भावनाएं भी देती हैं रोगों को आमंत्रण

भावनाएं मनुष्य के व्यक्तित्व को बनाती भी हैं और बिगाड़ती भी हैं पर नकारात्मक भावनाएं मनुष्य के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव डालती हैं। क्रोध, आत्मग्लानि, डिप्रेशन, भय, चिंता, उदासी आदि नकारात्मक भावनाएं हैं जो मनुष्य को रोगों का शिकार बना देती हैं और मनुष्य की आयु सीमा को कम कर देती हैं। आइए जानते हैं इन नकारात्मक भावनाओं को और मनुष्य पर इनके पडऩे वाले प्रभावों को।
बहुत ज्यादा गुस्सा या क्रोध:- क्रोध का कारण कुछ भी हो पर इसके परिणाम बहुत ही घातक होते हैं। जब व्यक्ति बहुत क्रोधित होता है तो उसका रक्तचाप बढ़ जाता है। कई बार तो क्रोधित व्यक्ति को दिल का दौरा तक पड़ जाता है, इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार क्रोध पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है। जब आपको बहुत गुस्सा आ रहा हो तो सबसे पहले तो यह सोचें कि क्या आपका क्रोध उचित है और क्रोध करने से कुछ फायदा होगा। अगर नहीं तो बेवजह क्रोध करके आप किसका नुकसान कर रहे हैं।
इसके अतिरिक्त गुस्से पर नियंत्रण के लिए आप अपना ध्यान कहीं और लगा लें। ऐसे क्षण में आप कोई किताब या हास्य पुस्तिका पढऩा प्रारंभ कर दें। आपका गुस्सा हंसी में बदल सकता है।
डिप्रेशन:- डिप्रेशन एक नकारात्मक भावना है पर अब तो यह अपने आप में एक गंभीर रोग बन चुका है। डिप्रेशन से पीडि़त व्यक्ति को हृदयाघात, उच्च रक्तचाप, नींद न आना और न जाने कितने गंभीर रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। डिप्रेशन के रोगी की हृदय गति बढ़ जाती है व ऐसे हार्मोन्स का स्तर भी अधिक हो जाता है जो तनाव उत्पन्न करते हैं।
ऐसे व्यक्ति निराशावादी हो जाते हैं और इनमें जीने की चाह भी कम हो जाती है। आप ऐसी स्थिति से दूर रहें, इसलिए अभी से अपनी जीवन-शैली को व्यवस्थित बनाएं। आत्मविश्वासी बनें, मेल जोल बढ़ाएं और सामाजिक बनिए। अपने को सिगरेट, शराब जैसे शौकों से दूर रखिए, जिन्दादिल बनिए।
चिंता:- चिंता चिता के समान है और व्यर्थ की चिंता तो भले चंगे व्यक्ति को भी रोगी बना देती है। थोड़ी बहुत चिंता करना तो मनुष्य का स्वभाव है पर जब ये चिंता सीमाएं पार कर लेती हैं तो रोगों को आमंत्रण देती हैं। चिंता से मुक्ति का सबसे सरल उपाय है व्यस्त रहना। अपनी चिंता की दुनियां से बाहर आएं। सामाजिक बनें। लोगों से मिलें, अपनी चिंता को दूर करने के उपाय ढूंढें।
हाथ पर हाथ धरे बैठ चिंता करने से कोई समस्या हल नहीं होती। कोशिश ही व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में लाती है, इसलिए इस चिंता रूपी अंधकार को अपने पर हावी न होने दें। कई शोधों से यह सामने आया है कि अधिक चिंता करने वाले व्यक्ति को हृदय रोगों की संभावना अधिक होती
है।
अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना:- यह ऐसी नकारात्मक सोच है जो मनुष्य के लिए बहुत घातक है। गुस्सा होने पर व्यक्ति जोर-जोर से चीखना शुरू कर दे तो यह भावना व्यक्त करना नहीं है। भावना व्यक्त करने का अर्थ है एक दूसरे से सुख-दुख बांटना जिससे आपके मन का बोझ हल्का हो। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहकर ही वह प्रसन्न व स्वस्थ रह सकता है। जो लोग अपनी भावनाओं को अपने तक ही रखते हैं, वे मानसिक तौर पर चिड़चिड़े व शारीरिक तौर पर बीमार रहते हैं, इसलिए अपनी भावनाओं को अपने परिवार के सदस्यों, दोस्तों, रिश्तेदारों पर व्यक्त करें।
कोई भी नकारात्मक भावना हो, उसे आप अपने आत्मविश्वास व आशावादी दृष्टिकोण से दूर कर सकते हैं। यह आपका स्वभाव नहीं बनने पाए, ऐसी आपकी कोशिश होनी चाहिए क्योंकि नकारात्मक भावनाएं सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि आपसे जुड़े व्यक्तियों को भी प्रभावित करती हैं इसलिए इन पर नियंत्रण पा कर सकारात्मक भावनाओं जैसे हंसना, प्यार, आत्मविश्वास व आशा को अपनी जिदंगी में जगह दें जो आपको अच्छा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य देने में मददगार हों।
-सोनी मल्होत्रा

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