प्रौढ़ कुमारियों का एकाकीपन

प्रौढ़ कुमारियों का एकाकीपन

प्राचीन युग में कन्या का विवाह उम्र के उस चरण में ही हो जाता था जहां लड़की ठीक तरह यह भी नहीं जानती थी कि आखिर विवाह चीज क्या है। अनेकों दशक यही परम्परा लिये हुए विदा हो गये। धीरे-धीरे बाल विवाह, अनमेल विवाह, दहेज समस्या, एक से अधिक विवाह आदि कुछ ऐसी समस्याओं ने जन्म लिया जिससे समाज के जागरूक बुद्धिजीवी वर्ग एवं समाज सुधारकों को यह मानना पड़ा कि इन समस्याओं के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारण बाल विवाह है।
बाल विवाह रोक कर सामाजिक परिवर्तन की एक लहर ऐसी आई जिसने प्रौढ़ कुमारियों के अस्तित्व को जन्म दिया। वर्तमान में यह निर्विवाद सत्य है कि प्रौढ़ कुमारियों का अस्तित्व स्वयं में एक नवीन समस्या बन चुका है। विवाह की उम्र आगे बढ़ा कर एक साहसी कदम तो उठाया गया किंतु प्रकृति को शायद यह सामाजिक परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। परिणामस्वरूप प्रौढ़ कुमारियां इस सामाजिक परिवर्तन के तले दब कर रह गई।
प्रौढ़ कुमारियां समाज में एक समस्या क्यों बन गई हैं। उनका दोष क्या है, अपराध क्या है। क्या विवाह ही जीवन की अन्तिम मंजिल और चिर-वांछनीय उपलब्धि है जिसके पाने के बाद कुछ शेष नहीं रहता और जिसके न पाने से दुनियां के सब रास्ते बंद हो जाते हैं। यदि ऐसा है तो वह परिस्थितियां, वह दशाएं जिनके कारण लड़की का ब्याह नहीं हो पाता, किसने उत्पन्न की हैं। कोई लड़की बचपन से यह प्रण नहीं लेती कि वह ब्याह नहीं करेगी। बचपन से गुड्डे-गुडिय़ा का ब्याह रचा कर वह अपने स्वप्न मूर्त करती है और फिर बड़ी होने पर समय से उसका ब्याह न हो तो इसमें उस लड़की का क्या दोष है।
हमारे समाज में विवाह 'किया' नहीं जाता बल्कि विवाह 'होता' है। फिर किसी प्रौढ़ कुमारी की ओर उठी हुई उंगली इशारा करके सदैव यही क्यों पूछती है कि 'इन्होंने विवाह क्यों नहीं किया।' प्रश्न यह है कि 80 प्रतिशत मामलों में विवाह तय करते समय लड़की की सहमति या असहमति लेना आवश्यक नहीं समझा जाता तो फिर इस प्रश्न का संबंध लड़की से क्यों है कि उसका विवाह क्यों नहीं हुआ। क्या यह एक विचारणीय प्रश्न नहीं है।
प्रौढ़ कुमारियों का दर्द कौन समझेगा। जीवनसाथी की रिक्तता से उत्पन्न उसके जीवन के शून्य में हर कदम पर साहस, प्रोत्साहन, प्रशंसा और दिलासे से भरने का साहस कौन करेगा, माता पिता, भाई बहन, सखी-सहेलियां, सहकर्मियां और आस-पड़ोस या कोई अन्य। यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो निष्कर्ष के तौर पर यही हाथ आयेगा कि सहयोग के नाम पर इन प्रौढ़ कुमारियों को जो मिलता है वह सहयोग कम, दया अधिक होता है।
माता-पिता कुछ वर्षों वर तलाशने की पीड़ा और ब्याह न कर पाने के आक्रोश से चाहे अनचाहे लड़की को दंशित कर ही देते हैं जबकि उसकी पीड़ा को सबसे अधिक मां को ही समझना चाहिये क्योंकि उसने उसे जन्म दिया है किंतु दुख और क्षोभ इस बात का है कि लड़की को कोसने में मां पीछे नहीं हटती। उसकी नजरों में लड़की का रूपवती न होना, कभी कम तो कभी अधिक पढ़ा लिखा होना, नौकरी करना या नौकरी न करना आदि तमाम बातें जो उसके विवाह न होने का बहाना बनती हैं, लड़की के ही दोष हैं।
इस स्वार्थी एवं शोषक व्यवहार की परिधि में भाई बहन और सखी सहेलियां भी पीछे नहीं रहती।
प्रौढ़ कुमारियों के प्रति यह दयनीय, पीड़ाजनक और काफी हद तक अपमानजनक व्यवहार करने का अधिकार समाज एवं परिवार को किसने दिया है। प्रौढ़ कुमारी के समक्ष हर समय विवाह की चर्चा यदि न की जाये तो क्या प्रकृति अपना नियम परिवर्तित कर देगी या दुनियां का कोई बड़ा काम अधूरा रह जायेगा।
समाज और परिवार इस बात का गंभीरतापूर्वक विश्लेषण करें और यह मानें कि प्रौढ़ कुमारियां समाज के लिये न तो अभिशाप हैं और न ही समस्या। केवल पति लाभ के सुख के अभाव में वे रंक भी नहीं हैं। प्रौढ़ कुमारियां भी समाज का ही एक अंग हैं और वह प्रभावशाली अस्तित्व भी हैं जो नितान्त एकाकी होने के बावजूद समाज के हर क्रिया कलापों का सफलता पूर्वक निष्पादन करने में पूर्णत: समर्थ और सक्षम हैं।
- रंजना श्रीवास्तव

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