अब जल्दी उडऩे लगा है औरतों का फ्यूज

अब जल्दी उडऩे लगा है औरतों का फ्यूज

रिश्तों को निभाने में औरतों की अहम भूमिका है। पहले जहां उनकी सहनशीलता की तुलना धरती से की जाती थी आज वे अपने को पुरूषों के बराबर ही नहीं बल्कि सुपीरियर होने का भ्रम पाल बैठी हैं। यही खत्म हो जाता है उनकी सहनशीलता का पूरा कोटा।
बचपन से ही विद्रोह के स्वर उनमें मुखर होने लगे हैं। वे मॉम डैड से पूरे जोश के साथ फिल्मी अंदाज में बहस करती हैं क्योंकि अब वे मॉम डैड कम, फ्रेंड ज्यादा बन गए हैं। ससुराल में जाते ही सास को सही कर देना अपने फ्रैंड सर्कल में उनके लिए गौरव की बात है।
सदा से पुरूष अपने गर्म मिजाज और औरत अपने धैर्य के लिये जानी जाती रही है। प्रकृति ने ही उन्हें ऐसा मिजाज देकर बैलेंस क्रिएट किया है जो परफेक्ट था लेकिन आज हम प्रकृति को चुनौती दे रहे हैं और अंजाम सामने है।
समाज में बढ़ते अपराध, तलाक, तथा जीवन से चैन ओ सुकून खत्म हो जाना, इसके पीछे औरतों की साइकॉलॉजी का बदलना एक मुख्य कारण माना जा सकता है, क्योंकि वे आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं। उनमें असुरक्षा की भावना नहीं। 'छूना है आसमान' उनका नारा है। पढ़ लिखकर वे इतनी काबिल हो गई हैं कि अपना निर्णय खुद लेने का माद्दा रखती हैं।
कार्यक्षेत्र विस्तृत होने से औरत का माइंडसेट, उसकी सोच भी बदल गई हैं। एक प्रिविलेज्ड लाइफ जीने वाली युवती को जीवन का आधा अधूरा ज्ञान ही रहता है। भले ही ग्लोबलाइजेशन के इस युग में उसे दुनियां की खबर हो वो बाहरी तौर से बेहद इंटेलिजैंट कर्मठ दिखाई दे लेकिन उसका आई. क्यू. का स्तर गिरता जा रहा है। मानवीय संवेदना न हो तो, क्या पुरूष क्या नारी, क्या रह जाएंगे?
हकीकत यह है कि आज हम जिस तरह की जिंदगी जी रहे हैं, वह बेहद स्टै्रसफुल और तनाव देने वाली है। बेसिक मानवीय गुण खत्म होने लगे हैं। छल कपट बेईमानी भरा बिहेवियर ही जब टैंऊड बन गया हो तो ऐसे में लोगों से डील करना वो भी उस वातावरण में जहां पुरूष अपने ईगो को लेकर डिफेंसिव हो औरत के लिये मुश्किल है जिसका सामना करते हुए वो अपना टैंपर लूज कर जाती है।
जो बातें गुण उसे शांति दे सकते थे, वे आज की हार्श जिंदगी में कहीं खो गए हैं। परिणाम है क्या महिला, क्या पुरूष सभी का बात बात पर फ्यूज उडऩा और उनका शॉर्ट टैंपर्ड और लड़ाका बन जाना।
- उषा जैन शीरीं

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