खुद ही अपनी बेटी को दांव पर न लगाये...!

खुद ही अपनी बेटी को दांव पर न लगाये...!

बात जरा कड़वी है लेकिन यह एक कड़वा सच ही है। दहेज की मांग से घबराए, चिंतित परेशान कई लड़कियों के मां बाप आज लड़की के हुस्न और शवाब को जिस तरह एनकैश करने पर जुटे हैं, वह एक ओपन सीक्रेट है।
जहां कोई सुंदर कमाऊ आसानी से बेवकूफ बनने वाला लड़का दिखा, वे अपनी बेटी को उसके पीछे लगा देते हैं इस मुहिम में कई बार उनके परिवार के अन्य सदस्य भी होते हैं। कई बार तेज़ तर्रार लड़की ही काफी होती है उसे जाल में फंसाने के लिए। लड़का सब्ज़ बाग़ दिखा सकता है लेकिन देखने वाली आंखें तो आपकी अपनी हैं। दिमाग कहीं गिरवी तो रखा नहीं होता है।
लड़की आज भी बेचारी ही मानी जाती है। ठीक उस कहावत की तरह कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली, वह सारे बुरे करम कर के पाक़ साफ बनने का नाटक करती है। कानून आज उसके साथ है। इसका वो कितना बेवजह फायदा उठाती है, यह हाल की ताज़ा कई घटनाओं से मालूम चलता है।
लड़के भी कोई दूध के धुले नहीं होते। कई निठल्लों का जीवन में उद्देश्य ही फ्री की मौज मस्ती होता है या बाप का पैसा लुटाने को है या खुद का कोई ईज़ी मनी कमाने का ज़रिया है। मध्य वर्ग, निम्न मध्य वर्ग की लड़कियों को ड्रेस, कॉस्मेटिक, ज्वेलरी और बढिय़ा होटलों में खाना और सैर सपाटे का आकर्षण रहता है। आज के गिरते नैतिक स्तर के युग में क्या अच्छा है 'क्या बुरा' उन्हें ये समझाने वाला कोई नहीं।
मां बाप के अपने निहित स्वार्थ हैं जो उन्हें हर उसूल को अपनी सुविधानुसार मोल्ड कर लेने को प्रेरित करते हैं। उनके जीवन में दोहरे मापदंड होते हैं। पैसा बचाने के लिए वे लड़की की इज्ज़त दांव पर लगाने से नहीं चूकते।
यह शत प्रतिशत भौतिकवाद में डूबे रहने का ही नतीजा है कि लोग अपनी संस्कृति को ही भूलते जा रहे हैं। आधुनिकता का जामा पहन लड़कियां आज हदें पार कर चुकी हैं। मां बाप मिट्टी के माधो बने उनके क्रिया कलाप देखते रहते हैं। अमीर घर का लड़का फंसाने पर मन ही मन खुश होते हैं। इसमें कहीं उन्हें अपनी भी सुरक्षा नजर आती है। पिता या बड़ी बहन या भाई स्वयं लड़की को लेट नाइट पार्टी के लिए फार्महाउस तक छोड़कर आते हैं। यह राह धंधे की ओर जाती है, क्या यह बात उनकी अनुभवी आंखें देख नहीं पातीं?
बेटियों को सीता सावित्री भले ही न बनाएं क्योंकि जमाना उस युग से बहुत आगे निकल आया है लेकिन उसकी कमाई का लालच छोड़ें। समय पर विवाह कर अपना कर्तव्य निभायें। बेटी में बेटा तलाशते हुए उसका जीवन दुरूह न बनाएं।
हमारे पूर्वजों ने समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिये कुछ अच्छे नियम निर्धारित किए थे। उन्हें तोलें, उनकी महत्ता समझें और तद्नुसार पालन करें। जो गलत था, उसका उन्मूलन कुछ हुआ, कुछ हो रहा है, कुछ शिक्षा के प्रसार से हो जाएगा लेकिन गलत के साथ जो सही है, समाज के हित में ही उसे कायम रखना हम सब की जिम्मेदारी है।

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