आखिर कब खत्म होगी नारी के प्रति दरिंदगी

आखिर कब खत्म होगी नारी के प्रति दरिंदगी

कोटा में एक सिरफिरे कथित प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की चाकू गोदकर हत्या कर दी। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित एक नाबालिग फिल्म अभिनेत्री जायरा वसीम के साथ दिल्ली से मुंबई की उड़ान में सहयात्री ने छेड़छाड़ की। घबराई अभिनेत्री ने मुंबई पहुंचकर सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो डाला, तब हलचल हुई।
यह बेहद शर्मनाक है कि देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) ने हाल ही में 2016 में देश भर में हुए अपराधों के आंकड़े जारी किए हैं जिसके अनुसार महिलाओं के प्रति हिंसा के 2016 में 3,38,954 मामले दर्ज किए गए जो 2015 (3,29,243) के मुकाबले 2.9 प्रतिशत ज्यादा हैं। इनमें 14.5 प्रतिशत मामले उत्तर प्रदेश में, 9.6 प्रतिशत पश्चिम बंगाल में हुए। आपराधिक मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। वहां महिला प्रताडऩा(घरेलू हिंसा) के 1,10,378 एवं यौन हमले के 84,746 मामले दर्ज हुए।
देश में दुष्कर्म के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 प्रतिशत बढ़े हैं। 2016 में देश में 38,947 दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए। सबसे ज्यादा 4,882 मध्य प्रदेश में हुए। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश रहा जहां 4,816 दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए। इस मामले में महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर रहा जहां 4,189 मामले दर्ज हुए। राजस्थान चौथे नंबर पर है। 2016 में यहां 3657 केस दर्ज हुए। महिलाएं घर से सड़क तक हिंसा का शिकार हैं। वे आसान शिकार मानी जाती हैं और बीते एक दशक में महिलाओं के प्रति हिंसा बढ़ी है।
देश में यूं तो महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार की ओर से कानून बनाने के दावे तो किए जाते रहे हैं पर क्या ये कानून असल में भी मददगार होते हैं? कई मामलों में देखने में आता है कि कानून के प्रावधान सरकारी बस्तों में ही बंधे रह जाते हैं और पीडि़ता या फिर उसके परिवार को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ता है। कानून तो हैं लेकिन इसकी पालना कौन कराएगा?
प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट 2005 महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए लागू किया गया। यह भारतीय दंड संहिता 498 ए के तहत आता है। इसके तहत महिला के खिलाफ किसी भी तरह की मानसिक या शारीरिक हिंसा या प्रताडऩा आती है। दहेज निषेध कानून 1961 किसी भी व्यक्ति को दहेज लेने या देने व मदद करने से प्रतिबंधित करता है। उल्लंघन पर 5 साल या उससे अधिक की जेल व दहेज अनुसार जुर्माना लगता है। जुवेनाइल जस्टिस(केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट 2015 के तहत जघन्य अपराध करने वाले 16 से 18 वर्ष किशोरों को वयस्क अपराधियों की तरह सजा का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत उम्र नहीं, जुर्म को पैमाना माना गया है। प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसस एक्ट (पॉस्को) 2012 के तहत नाबालिग बच्चों से होने वाले यौन अपराध और छेड़छाड़ पर कार्रवाई की जाती है। नाबालिगों से जुड़े मामलों की सुनवाई विशेष अदालत में होती है। पीडि़त पक्ष को कानूनी मदद भी दी जाती है। सात साल से लेकर उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।
आज यह विचार का एक महत्वपूर्ण विषय है कि भारत का संविधान अपने जिस अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) के जरिए महिलाओं को लिंग भेद किए बगैर जिस समानता को देने की बात करता है और अपने अनुच्छेद 21 के जरिए विशेषत: महिलाओं को बिना लैंगिक भेदभाव के जीने का जो अधिकार प्रदान करता है, क्या सचमुच हमारा नारी समाज इस संवैधानिक लाभ का उपभोग कर पाता है?
पूरे देश में रोजाना न जाने कितनी मासूम बच्चियां नर पिशाचों का शिकार होती हैं। ज्यादातर मामले पुलिस या कानून के संज्ञान में ही नहीं आते। कुछ आते भी हैं तो उन्हें तमाम कानूनी और सामाजिक पेचीदगियों का हवाला देकर रफा-दफा करने के प्रयास किए जाते हैं। निर्भया कांड के बाद सड़क से संसद तक हुए बवाल के बाद दुष्कर्मियों को फांसी की सजा का कानून बना लेकिन आज तक कितनों को फांसी हुई? कानून की क्रियान्विति में इतने झोल छोड़ दिए जाते हैं कि कई साल सुनवाई और अपीलों में ही निकल जाते हैं। दुष्कर्म के मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतों में समयबद्ध फैसले हों और कड़ी से कड़ी सजा मिले तो हैवानियत में कमी की उम्मीद की जा सकती है।
मीडिया की वजह से जनता में सजगता आई है। लोग घटनाओं के विरोध में घर से बाहर निकलने लगे हैं पर यदि लोग किसी घटना में मौत होने के बाद विरोध करते हैं बजाए कि जब पीडि़ता जिंदा होती है तो समाज उसके साथ कैसे व्यवहार करता है, इस आधार पर समाज का आकलन होना चाहिए। इस आधार पर भारतीय समाज परिपक्व नहीं है। समाज में बहुत ही ऐसे मामले सामने भी नहीं आ पाते। जो मामले सामने आ जाते हैं उनका असली दर्द तो कार्रवाई शुरू होने के बाद होता है। पीडि़ता को समाज के तानों और महंगी न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। कई बार तो ऐसे लोग ही महिला अधिकारों की बात करने लग जाते हैं जो अपराधी रह चुके हैं और लोगों को उनका इतिहास भी पता नहीं होता।
आज बड़ा सवाल है कि महिलाओं पर अत्याचार या फिर अपराध बढ़ रहे हैं? दरअसल, नए परिवेश में सामाजिक मूल्यों का भी पतन हुआ है। पश्चिमी समाज की शैली में लिव इन रिलेशन की परिपाटी सामने आ रही है। ये विवाह रूपी स्थापित संस्थान के प्रति खुली चुनौती के समान है। हो सकता है कि कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखें लेकिन सदियों से चली आ रही विवाह की परंपरा समाज का मूल आधार रही है। इस प्रकार के संबंधों में कई बार परिणति अपराध के रूप में सामने आती है। हां, ये सही है कि आज की महिलाएं बाहरी समाज के प्रति खुला सोच रखती हैं। उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए। महिलाओं के प्रति अपराध की मानसिकता पुरूषसत्तात्मक समाज का बाय प्रोडक्ट है। बेहतर कानून व्यवस्था और सोच में बदलाव से हालात सुधर सकते हैं।
-नरेंद्र देवांगन

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