आखिर नारी संघर्ष क्यों नहीं करना चाहती

आखिर नारी संघर्ष क्यों नहीं करना चाहती

आधुनिकता और प्रगतिवादिता के इस बदलते परिवेश में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी योग्यता सिद्ध कर चुकी हैं। समय के थपेड़ों ने नारी में अभूतपूर्व परिवर्तन कर दिया है। घूंघट की ओट और घर की चार-दीवारी से बाहर निकल कर नारी ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। पुरूष प्रधान समाज में अपनी महत्ता दर्शा दी है।
फिर भी सफलतम स्त्रियों की संख्या गिनी चुनी है। अन्य महिलायें इनके जैसा बनना या करना चाहती है किन्तु बन नहीं पाती क्योंकि राह संघर्षपूर्ण है। संघर्ष के लिये जिजीविषा चाहिए, दृढ़ इच्छा शक्ति, अदम्य साहस व हौसला चाहिए। कुछ पाने के लिये कुछ खोना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन नारी संघर्ष क्यों नहीं करती या करना नहीं चाहती।
वैसे देखा जाये तो नारी एक हद तक संघर्ष करती है, फिर उससे विमुख हो जाती है। अपने आपको एक निश्चित दायरे के भीतर समेट लेती है, ऐसा क्यूं?
प्राय: नारी अपना संघर्ष कालेज जाकर डिग्री हासिल करने तक ही रखती है। डिग्री हासिल हो जाने पर वह नौकरी या व्यवसाय करने के बजाय सिलाई, कढ़ाई या पाक कला जैसे क्षेत्रों तक सीमित होकर रह जाती है। आखिर वह संघर्ष करने से क्यों कतराती है।
कई स्त्रियां संघर्ष तो करती हैं, किंतु घर परिवार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता। ताने, व्यंग्य, अपमान या कटु वचनों से पाला पडऩे पर स्त्री टूट जाती है। कइयों के पारिवारिक सदस्यों का संकुचित दृष्टिकोण, उनके कदमों को बाहर जाने से रोके रखता हैं
हम 21 वीं सदी के मुहाने पर खड़े हैं, किन्तु पुरानी घिसी पिटी, सामाजिक, रूढिय़ों, परंपराओं की बेडिय़ों में आज भी नारी जकड़ी हुई है।
अनेक नारियां अपनी योग्यता, प्रतिभाव कला को ताक पर रख बिसरा देती हैं वे अपने आपको घर परिवार के सुखमय जीवन के लिये झोंक देती हैं। अपना सर्वस्व इन्हें पर न्यौछावर कर देती हैं।
कई महिलाएं पढ़ाई को बोर मानती हैं। अत: उनसे संघर्ष करने की अपेक्षा उचित नहीं है जबकि शिक्षा अनमोल सम्पति है। विद्या अर्जन से हम अपने व्यक्तित्व में निखार ला सकते हैं। पढ़ाई कभी बेकार नहीं जाती। जीवनकाल में कहीं न कहीं इसका सदुपयोग किया जा सकता है।
हमें संघर्ष जारी रखना है, यह बात किरण बेदी, अरून्धति राय, डायना हेडन, मेघा पाटकर आदि ने सिद्ध कर दी है जो आज अपनी सफलता का परचम पूरे विश्व में लहरा रही हैं।
संघर्ष को छोडऩे के बजाय प्रगति के पथ पर बढ़ते जाना है। इसके लिए चाहे कितनी मुसीबतें, कठिनाइयां बाधाएं क्यूं न रास्ते में रोड़ा अटकायें, नारी को जूझना होगा, संघर्ष करना ही होगा। तभी घर परिवार व समाज के साथ-साथ राष्ट्र को भी नारी का असीमित सार्थक योगदान मिल सकेगा जो नारी शक्ति का अद्भुत परिचायक होगा।
-सुमित्रा यादव

Share it
Top