तनाव बढ़ाते हैं विवाह पूर्व सैक्स संबंध

तनाव बढ़ाते हैं विवाह पूर्व सैक्स संबंध

भारतीय सभ्यता और संस्कृति में विवाहेत्तर यौन संबंधों को कभी भी जायज नहीं माना गया। भारतीय समाज में इसे अनुचित और घृणित पाप कर्म माना जाता है, इसलिए अधिकांश भारतीय विवाहेत्तर यौन संबंधों से दूर रहने का प्रयास करते हैं लेकिन आज पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित युवा वर्ग इस मान्यता को तोडऩे में लगा है। आज का युवा वर्ग प्यार और वासना में एक साथ गोते लगाना पसंद करता है जिसके कारण तनाव, तलाक, आत्महत्या, हत्या और बलात्कार की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
अवैध यौन संबंधों एवं रोमांस के कारण कई परिवार बिखरने के कगार पर पहुंच गये हैं। अवैध रूप से स्थापित यौन संबंध शादी से पहले या शादी के बाद दोनों ही स्थितियों में हानिकारक होते हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति पर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के हमले के कारण लोगों में वस्त्रों की तरह 'यौनसंगी बदलने का फैशन चल पड़ा है। इस प्रवृत्ति वाले लोग अपने को भले ही सभ्य समझें लेकिन वे वास्तव में असभ्य हैं। नैतिक पतन की नींव पर खड़ी प्रगति बेकार है। भौतिक सुख सुविधा के साधनों और वासना के वशीभूत जीनेवाला वर्ग समाज को प्रदूषित ही कर रहा है। जीवन की गाड़ी विश्वास के सहारे चलती है। यदि एक दूसरे पर विश्वास ही न हो तो जिंदगी तनावपूर्ण तो होगी ही, जीवन नरक भी बन सकता है।
विवाह को भारतीय संस्कृति में एक पवित्र धार्मिक संस्कार माना गया है। विवाह संस्कार के पश्चात दो प्राणी एक हो जाते हैं। हमारे 16 मुख्य संस्कारों में से विवाह भी एक है और यह सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक संस्कार है। इसी संस्कार के सहारे गृहस्थाश्रम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरूषार्थो का पालन हो सकता है। यह संस्कार दो अजनबी प्राणियों को जोड़ कर एक कर देता है। उन्हें हमसफर और जीवन साथी बना देता है। इसीलिए पति-पत्नी को दांपत्य जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए कहा गया है।
विवाह ही वह पवित्र एवं अटूट बंधन है जिसके सहारे दंपति इस संसार यात्रा को पूरा करते हैं। इस यात्रा में उतार-चढ़ाव आते हैं, अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन ऐसी विषम परिस्थितियों में उनके दांपत्य जीवन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।
मनुष्य की यह प्रवृत्ति होती है कि वह अवगुणों को तलाशता है और उसी में उलझकर पूरी जिंदगी वाद-विवाद में ही नष्ट कर बैठता है। यदि पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के अवगुणों को ढूंढने के बजाए एक दूसरे के गुणों की सराहना करें और उसी में सुख, शांति और संतोष ढूंढें तो फिर जीवन में अप्रिय क्षण आए ही नहीं।
पाश्चात्य देशों में विवाह कोई पवित्र संस्कार नहीं बल्कि स्त्री, पुरूष का एक साथ रहने का अनुबंध मात्र है जिसे जब चाहा, तोड़ दिया जबकि भारत में इसे एक पवित्र संस्कार माना गया है। पाश्चात्य संस्कृति में यौन संबंध के लिए विवाह आवश्यक नहीं है जबकि भारत में विवाहेत्तर यौन संबंध को घृणित पापकर्म माना गया है। भौतिकता और दौलत के नशे में चूर लोगों को पाश्चात्य जीवन शैली बहुत पसंद है। धन हर बुरे कर्म को ढक देता है। पर्दे की आड़ में रहने वाले लोग भले ही अपने को सुरक्षित समझकर खुश हैं लेकिन वे एक बहुत बड़े संकट को आमंत्रण दे रहे हैं।
सैक्स जीवन की आवश्यक मांग है और यह स्त्री-पुरूष दोनों के लिए जरूरी है और इस मांग की पूर्ति भी जरूरी है। विवाह की व्यवस्था इसी मांग की पूर्ति के लिए हुई लेकिन आज बहुत सारे पढ़े लिखे लोग इस व्यवस्था की अनिवार्यता को अस्वीकार कर रहे हैं। उनकी नजर में विवाह एक अनावश्यक बंधन है। विवाहित लोगों का जीवन तनावपूर्ण हो जाता है। जीवन नरक बन जाता है।
कुछ लोग नयापन चाहते हैं जबकि विवाहित जीवन में नीरसता आ जाती है और स्त्री-पुरूष दोनों में असंतुष्टि बढ़ती है। ऐसे लोग अवैध सैक्स संबंधों में रूचि लेते हैं। हमबिस्तर बदलते हैं। ऐसे युवक-युवती, स्त्री-पुरूष निश्चय ही भविष्य में सामाजिक संरचना को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।
जीवन में विवाह के कारण तनाव उत्पन्न नहीं होता बल्कि हम अपने शंकालु व विवेकहीन स्वभाव के कारण तनाव को जन्म देते हैं। प्यार कभी घटता बढ़ता नहीं लेकिन जब प्यार की आड़ में सैक्स भूख की पूर्ति ही लक्ष्य बन जाता है तो मतभेद पैदा होते हैं। अहं की भावना पैदा होती है। बुद्धि भ्रष्ट हो व्यक्ति केवल बुरा सोचने लगता है। कर्तव्यच्युत दंपति एक-दूसरे की गलतियां ढूंढ़ते रहते हैं और गलतियां मिलते ही दोनों में टकराव शुरू हो जाता है। जरा सी बात पर दोनों में तू-तू-मैं-मैं होने लगती है। परिवार की सुख शांति नष्ट हो जाती है। जीवन भर साथ निभाने की कसमें खाने वाले दंपति एक-दूसरे से दूर होते जाते हैं। कभी कभी स्थिति विस्फोटक होकर मामला तलाक तक पहुंच जाता है। पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। इसके बावजूद जरुरी नहीं है कि तलाक के बाद जीवन सुखमय हो जाये।
जवानी की ओर कदम बढ़ाते समय कई बार अनजाने में वह गलती हो जाती है जो नहीं होनी चाहिए। प्यार किसी से होता है और विवाह किसी और से। ऐसे में प्यार में मिली असफलता की सजा किसी और को देना उचित नहीं है।
उस कच्ची उम्र के प्यार में प्यार कम तथा वासना का खेल अधिक होता है। सच्चे प्रेमी का प्यार पवित्र होता है। उसमें वासना का कोई स्थान नहीं होता। प्यार दिल से, विचार से और भावनाओं से होता है। यदि प्यार की आड़ में सैक्स की भूख शांत करने की भावना पैदा हो जाए तो यह प्यार का अपमान है।
प्यार को अपमानित करने वाले सब कुछ करते हुए भी कंगाल हो जाते हैं। नफरत की आग में झुलसते रहते हैं। उनकी अच्छी भली जिंदगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। बुद्धि का विनाश हो जाता है। बुद्धि के बिना जिंदगी मूल्यहीन हो जाती है।
पति-पत्नी की गलतियों का खमियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। बेचारे अबोध बच्चे मां-बाप के पद चिन्हों का अनुसरण करते हैं। हमारी आने वाले भावी पीढ़ी को इसी पीड़ा से पीडि़त तनाव को झेलना पड़ेगा यदि अवैध यौन संबंधों को रोकने का सार्थक प्रयास नहीं किया गया।
- अर्पिता तालुकदार

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