कब तक शोषित होती रहेगी नारी

कब तक शोषित होती रहेगी नारी

लोग कहते हैं कि समाज में जागरूकता आ रही है और वह प्रगति की ओर बढ़ रहा है लेकिन नारियों की बात आते ही अभी भी लोग सौ-साल पीछे पहुंच तमाम रूढिय़ों और परंपराओं की दुहाई देने लगते हैं। उनके इर्द-गिर्द एक ऐसा घेरा खींच देते हैं जिससे निकलने के लिये बहुत सी औरतों में कोई छटपटाहट भी नहीं होती क्योंकि ज्यादातर औरतें भी मान चुकी हैं कि संत्रस, कुंठा और पीड़ा ही उनके कृत्यों का उपहार है।
कुछ अपवाद छोड़ दिये जायें तो नारी की स्थिति में कहीं बदलाव दिखाई नहीं देता। जो थोड़ा बहुत बदलाव है, वह अभिजात्य वर्ग में है। निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखने वाली स्त्री हर कदम पर शोषित है। महिलाओं की स्थिति ऐसी क्यों है? क्यों हम उसे पुरूषों की तरह समानाधिकार देने से कतरा जाते हैं?
अविश्वास भावना
नारी पर पुरूष का सबसे बड़ा अत्याचार उसकी अविश्वास भावना है। हमारे संस्कृतिकारों ने बड़ी सतर्कता से उसे सोने की बेडिय़ों में बांधने की कोशिश की है। बचपन में पिता उसकी चौकसी करे, युवावस्था में पति निगरानी रखे और वृद्धावस्था में पुत्र का पहरा रहे, मतलब जीवन उसका और शर्तें दूसरे की। बावजूद उसकी इस गुलामी के, यह जानते हुए भी जिस औरत ने मर्दों की दुनियां बनाई है उस औरत का उनसे भाई, पुत्र, दोस्त आदि कोई भी रिश्ता हो सकता है-वे उसकी पवित्रता पर इतनी जल्दी संदेह करने लगते हैं कि औरत अपने जन्म को गुनाह के रूप में स्वीकारने लगती है।
असुरक्षा की भावना
क्या वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व आर्थिक, सामाजिक आजादी और तरक्की के बावजूद सामाजिक सुरक्षा ज्यादातर महिलाओं से दूर, बहुत दूर है? क्या कारण है कि उच्चतम् स्तर तक पढ़-लिख जाने के बाद भी असुरक्षित होने का अहसास महिलाओं के दिलो-दिमाग पर काबिज रहता है? क्या वजह है कि आजादी के इतने वर्ष पूरे होने के बाद भी भारत जैसे देश में गांव तो गांव, शहरों तक में रात होने पर लड़की या महिला स्वछंद होकर निर्भयता पूर्वक अकेली बाहर जाने का साहस नहीं जुटा पाती?
सेक्स
किसी औरत को उसकी मर्जी के खिलाफ 'सेक्स' के लिये मजबूर करना अगर बलात्कार का मापदण्ड है तो भारत की 90 करोड़ आबादी में अधिकतर विवाह मां-बाप की सहमति से रचे जाते हैं और दुल्हन को एक अनदेखे बिन-समझे व्यक्ति द्वारा यौन आक्रमण को जैसे-तैसे स्वीकारना पड़ता है। क्या यह बलात्कार नहीं है? दूसरे शब्दों में अगर इसे दुल्हन का धार्मिक आडम्बरों के साथ बलात्कार करना कहा जाये तो शायद गलत नहीं होगा।
उदाहरण के तौर पर एक पति का शराब में मस्त होकर पत्नी से सहवास करने का मूड बनता है। जब पति शराब के नशे में चूर अपना शरीर ही नहीं संभाल पाता, लडख़ड़ाता चलता है, मुख से कच्ची शराब के भभके निकल रहे हों, गाली की बौछार हो रही हो, पत्नी किस प्रकार उसकी शारीरिक क्षुधा को शान्त करने के लिये प्रस्तुत होगी?
यौनाधिकार
विगत कुछ वर्षों से नारी की दिशा-दशा को लेकर आयोजित होने वाले सम्मेलनों, सभाओं में शायद ही कोई ऐसा अवसर आया हो जब यौनाधिकार का मुद्दा न उठा हो पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। कारण स्पष्ट है-पुरूष से स्त्री के फासले की कहानी बहुत लम्बी है, इतनी लम्बी कि स्त्री अपने अधिकारों को भूल गई है। वह यह भी भूल गई कि अपने दिल, दिमाग और शरीर पर उसका भी कुछ अधिकार है। कारण हमारी सामाजिक संरचना ही ऐसी है कि लोगों को आज्ञा देती हुई, निर्णय लेती स्त्री अजीब लगती है।
पुरूष सदियों से अपने मातहत देखते आए हैं - घर में भी और बाहर भी। काबिल मानने में पुरूष का अहम् आड़े आता है। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि नारी के भी कुछ यौनाधिकार हैं या संतान के लिंग निर्धारण में वह अंतिम निर्णय ले सकती है क्योंकि अपनी कोख पर उसका ही अधिकार है। ऐसे में यौनाधिकार की बात करना बेमानी है, क्यों समाज उसको इसकी भी स्वतंत्रता देने में कतराता है।?
स्त्री का वास्तविक शक्तिकरण करना हो तो कम से कम उसे पति की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सेदार बनाना होगा। आत्माओं का मिलन हो, शरीर एकाकार हो जाये किन्तु पुरूष और स्त्री की आर्थिक स्थितियों में एकाकारिता का कोई तत्व न हो, यह कौन सा न्याय है?
- सुश्री आरती यादव

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