कितना प्रदूषण है आपके घर में?

कितना प्रदूषण है आपके घर में?

प्रदूषण आज संसार की सबसे प्रमुख समस्या है जिससे पर्यावरण शास्त्री, वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी सभी चिंतित हैं लेकिन हम उस प्रदूषण के प्रति चिंतित नहीं हैं जो हमारे घर के आसपास का है, घर के अंदर का है, रसोईघर का है।
कारखाने, पेट्रोल चालित वाहन नदियों का प्रदूषित जल आदि पर तो सबका ध्यान जाता है लेकिन हमारे घर में व घर के आस-पास के प्रदूषण के प्रति हम उदासीन हैं। आइये, हम अपने घर के अंदर होने वाले प्रदूषण के बारे में जानें और उससे बचने का प्रयास करें।
हमारे दैनिक इस्तेमाल में कई ऐसी चीजें आती हैं जिन्हें हम आधुनिक जीवन का अनिवार्य अंग मानते हैं लेकिन उनके प्रभाव भयानक रूप से हानिकारक होते जा रहे हैं। नये शोधों से यह पता चला है कि कई प्रकार की धातुएं, प्लास्टिक रसायन व गैस जो हम नित्य काम में लाते हैं उनसे स्वास्थ्य की बड़ी क्षति हो रही हैं।
प्रारंभ हम रसोईघर से करते हैं। नल जिससे रसोई घर में पानी आता है, उसके जोड़ों में यदि रांगा है तो वह पानी को विषैला करता रहता है। पीतल की टंकियां पीतल का विष घोलती हैं। जिन बर्तनों पर हम कलई करवाते हैं, उसमें रांगा मिला होता है जो अक्सर कलई के महंगे होने के कारण मिला दिया जाता है।
इसी प्रकार एल्यूमीनियम में भी जल के प्रभाव से हानिकारक विष का निर्माण होता है। हम पानी को साफ करने के लिए फिल्टर लगाते हैं, उनमें लगी बत्तियों या चलनियों को समय-समय पर बदलते रहना चाहिए अन्यथा इन फिल्टरों में ही कीटाणु पनपते रहते हैं और पानी पीने योग्य नहीं रहता।
धातु के बाद हम प्लास्टिक का उपयोग भी खूब करते हैं। प्लास्टिक में भी कई प्रकार के हानिकारक तत्व उत्पन्न होते हैं। फ्रिज के अंदर पानी को ठण्डा रखने के लिए प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल होता है उनसे खतरा भी उत्पन्न हो सकता है। यदि पुराने प्लास्टिक को गलाकर तेज रंग मिलाये गये उनके बने खिलौने बच्चों के लिये हानिकारक हो सकते हैं।
रसोई में ईंधन के रूप में गैस का प्रयोग आम हो गया है। गैस जलने में बहुत कम मात्र में नाइट्रोजन ऑक्साइड भी देती है। जिन चूल्हों में गैस पूरी तरह जलती हो, उनमें कार्बन मोनोऑक्साइड गैस निकलती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड से गले व फेफड़ों में जलन होती है तथा दमा रोग बिगड़ता है। कार्बन मोनोऑक्साइड तो घातक जहर है, ही इसलिये रसोईघर का कमरा हवादार होना आवश्यक है, साथ ही गैस के चूल्हे की सफाई व रख रखाव भी ठीक होना चाहिए।
आजकल साबुन के स्थान पर डिटर्जेन्ट पाउडर का उपयोग आम हो गया है। इससे नदी-नालों में जहरीला प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। साथ ही घरों में इससे तरह-तरह के चर्मरोग फैल रहे हैं। उन्नत देशों में तो सुरक्षित डिटर्जेन्ट मिलने लगे हैं लेकिन विकासशील देशों में इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। यदि डिटर्जेन्ट पाउडर कपड़ों से पूरी तरह नहीं निकाला गया तो शरीर के साथ लगे कपड़ों से चर्म रोग भी फैल सकता है।
घरों में मच्छर, खटमल व मक्खी मारने के लिए जो कीटनाशक उपयोग में लाये जाते हैं उनको सूंघने से कई प्रकार के श्वास रोग हो सकते हैं। यदि वे भोजन में मिल जायें तो और भी हानिकारक हो सकते हैं। जहां तक संभव हो प्राकृतिक कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
- कर्मवीर अनुरागी

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