जब आत्मसमर्पण ही हो विकल्प

जब आत्मसमर्पण ही हो विकल्प

हर जगह झांसी की रानी बनना समझदारी कतई नहीं कहलाएगी। लड़कियां बहादुरी का काम करती हैं, उन्हें तरह-तरह के सम्मान, मैडल्स और प्रशंसा के फूलों से नवाजा जाता है। ठीक है कहीं लग गया दांव लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। बहादुरी भी समझदारी से दिखाई जाए, तभी वो बहादुरी कहलाएगी। किसी भौतिक वस्तु या अस्मत को लेकर जान गंवा देना क्या उचित है? सेंटिमेंट्स के नाम पर भी नहीं। लालच तो खैर बुरी बला है ही। आए दिन ऐसे न जाने कितने हादसे होते हैं जिसमें लड़कियां किसी ऐसी चीज को बचाने के लिए जान जोखिम में डाल देती हैं जिसकी वैल्यू जान के सामने कुछ भी नहीं होती।
अभी कुछ समय पहले की दुर्घटना है जब बदमाशों की दरिंदगी का शिकार बनी एथलीट अरूणिमा सिंहा जो कि प्रदेश स्तर की एथलीट थी। सी आई एस एफ में कांस्टेबल के पद पर भरती के लिए इंटरव्यू देने जब रात में पद्मावत एक्सप्रेस से नोएडा जा रही थी, करीब आधा दर्जन बदमाशों ने जो उसी टेऊन में सवार थे, अरूणिमा के गले से सोने की चेन खींचने का प्रयास किया। उस के विरोध करने पर बदमाशों ने उसे चलती टेऊन से धक्का देकर नीचे गिरा दिया। रीढ़ में फ्रैक्चर तथा पैर कट जाने के साथ रात के छह घंटे बहते खून मजबूरी दर्द के साथ अरूणिमा ने कैसे गुजारे होंगे, यह मानवीय त्रासदी की दिल हिला देने वाली घटना है।
ऐसी घटनाएं बड़ी न्यूज बन जाती हैं जब इसमें वेस्टेड इंट्रेस्ट वाले लोग घुस आते हैं जिन्हें मानवीय संवेदनाओं से कुछ लेना देना नहीं होता। प्रशासन को क्रिटिसाइज करते-करते लोग थक जाएं लेकिन सब कुछ सही हो पाना न इतना आसान है न इसके निकट भविष्य में होने के आसार नजर आते हैं।
जो जैसा है उसे स्वीकार करना ही जब नियति हो, तब क्या किया जाए? आत्मसमर्पण जीने का एक आसान सुलभ तरीका मान लेना ही क्या उचित नहीं होगा?
अरूणिमा के और इस जैसे हजारों लाखों केस में लड़कियां कितनी बड़ी त्रासदी से बच सकती थीं अगर वे बेमौके की बहादुरी न दिखातीं। कई बार सिरफिरे बदमाश 'माल भी जान भीÓ का फंडा इस्तेमाल करते हैं। वहां तो जान बचाने को बहादुरी दिखाने के सिवा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं रहता लेकिन जहां केवल माल या अस्मत ही बदमाशों का उद्देश्य हो, वहां उन्हें वो देकर जान बचाना समझदारी है। अस्मत सिर्फ जिस्म पर एक घाव मानकर चलना चाहिए। उसे लेकर इतना सेंटिमेंटल होना आज के युग में व्यावहारिकता नहीं कहलाएगा।
आज जब बदलाव की आंधी में जीवन शैली, सोच विचार, सामाजिक वातावरण सब कुछ इतना बदल चुका है तो अस्मत को लेकर वही पुरानी विचारधारा क्यों? इसे उतनी ही अहमियत दी जानी चाहिए जितनी जायज है, जिंदगी से बढ़कर नहीं।
दरअसल यह एक ट्रांजीशनल पीरियड है। नये पुराने के कशमकश में कोई एक विचारधारा अपने को स्थापित नहीं कर पा रही है।
इधर लड़कियां नई-नई आजादी की रौ में अपने लिए कोई भी मूल्य निर्धारित नहीं कर पा रही हैं। यही हाल पुरूष वर्ग का है। लॉ एंड ऑर्डर बेहद लचर हैं। समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। लड़कियां बाहर तो निकली हैं लेकिन उनकी सुरक्षा पर हमेशा खतरा मंडराता नजर आता है।
सेफ्टी मेजर्स वे जरूर सीखें लेकिन उन्हें कहां कैसे कब प्रयोग में लाना है, यह भी सीखना उतना ही जरूरी है। अरूणिमा के केस में क्या एक अकेली लड़की छह मुस्टंडों का सामना कर पाती? यहां बुजदिली का पाठ पढ़ाना उद्देश्य नहीं है। जज्बात के साथ सोच का तालमेल रखना भी जरूरी है। हिम्मत व बहादुरी रिलेटिव होनी चाहिए।
- उषा जैन 'शीरीं'

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