शादियों का विकृत होता स्वरूप

शादियों का विकृत होता स्वरूप

भारतीय संस्कृति में विवाह एक विशेष उत्सव माना जाता है, इसलिए इसे बड़े उत्साह और धूमधाम से किया जाता है। वैसे विवाह सात वचन और अग्नि के सात फेरों के साथ जीवन भर साथ निभाने की रस्म है लेकिन कुछ मिनटों में हो सकने वाली इन रस्मों के लिए यदि विदेश से फूलों का जहाज आए और पूरा नगर बिजली की रोशनी से जगमगाए या एक नकली विशाल महल ही खड़ा कर दिया जाए तो उस पर इतना खर्च हो जाता है जिससे हजारों की रोटी जीवन भर चल सकती है।
पर यह बात तो हुई उन संपन्न लोगों की शादी की जिसके लिए न तो उन्हें किसी से उधार लेना पड़ता है, न ही कर्ज और न ही घर या जमीन बेचना पड़ता है। हां, इस चकाचौंध का असर मध्यवर्ग पर जरूर पड़ता है जो यह सोचता है कि यदि पूरा नगर सजाया गया है तो मैं क्या अपना घर भी नहीं सजा सकता? और इसके लिए वह अपनी जमापूंजी तो खर्च करता ही है, कर्जदार भी बन जाता है। एक गरीब कन्या का विवाह हो जाए, इतना खर्च तो लेडीज संगीत तैयार कराने वाला ले लेता है। क्या ये सब दिखावा आवश्यक खर्च है? क्या लड़की होना इन सबकी वजह से बोझ है? और क्या मात्र दहेज ही सामाजिक कुव्यवस्था का जिम्मेदार है या मानवीय मानसिकता भी जिसने विवाह को एक व्यापार बना दिया है?
पहले बरात आती थी तो कई दिन रूकती थी। लड़की के घर-परिवार का हर सदस्य बरातियों की खातिर करता था। बराती बनकर जाना मतलब दो या तीन दिन की बादशाहत थी लेकिन तब और अब में फर्क यह है कि अब बराती-घराती में फर्क होता ही नहीं। न कोई काम करना चाहता है, न ही जिम्मेदारी निभाना चाहता है। सभी साहब बनकर आते हैं, इसलिए केटरर का प्रचलन अधिक हो गया है जो बेहद खर्चीला है। पुराने समय में कन्या पक्ष वर पक्ष वालों को मान-सम्मान हेतु भेंट देता था व अपनी कन्या के उपयोग के लिए उसकी पसंद की वस्तुएं लेकिन यह उपहार दानवीय आकार ग्रहण कर दहेज बन गया है। दहेज के साथ जो दिखावा व तड़क-भड़क जनजीवन और समाज के साथ जुड़ गया है, वह विवाह में अधिक कमर तोड़ देने वाला है।
पहले विवाह की सभी रस्में गीत-संगीत व ढोलक की थाप के साथ घर-परिवार की महिलाओं के बीच होती थीं। बहन, बुआ, चाची, ताई और मुहल्ले व पड़ोस की महिलाएं जुटतीं तो तरह-तरह के मधुर गीतों के साथ रस्में निभातीं जिससे घर में रौनक हो जाती। अब घर- परिवार हम दो हमारे दो ने सीमित कर दिए। अब चाची, ताई आदि रिश्ते सीमित हो गए हैं तो रौनक के लिए किट्टी पार्टी, क्लब आदि में बनाए रिश्ते ही सबसे ऊपर हो जाते हैं। ये रिश्ते अब केवल जेवर-कपड़े की नुमाइश मात्र हो गए हैं। अब पुरानी रस्मों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। अब वे रस्में नए अंदाज में नजाकत से किट्टी पार्टी की महिलाओं को बुलाकर होती हैं।
दिखावे में जो खर्च होता है वह अपव्यय है। हर वस्तु को सजाकर प्रस्तुत करना अच्छा है लेकिन अब सजावट वस्तु से अधिक मूल्य की होने लगी है। पहले मात्र गोटे और कलावे से कपड़े बांध दिए जाते थे लेकिन अब उनको तरह-तरह की टेऊ आदि में कलात्मक आकार देकर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें दो राय नहीं कि यदि कलात्मक सोच है तो अच्छा लगता है लेकिन अब इसने भी व्यापार का रूप ले लिया है। जहां एक तरफ दहेज प्रदर्शन बिलकुल निषिद्ध है, वहीं दूसरी तरह सजी हुई दहेज की साडिय़ां व जेवर वगैरह दिखाने के लिए लंबी जगह का इंतजाम किया जाता है। अफसोस तब होता है जब उस सजावट को एक क्षण में तोड़कर कोने में ढेर कर दिया जाता है। तब यह लगता है यदि उतना मूल्य देय वस्तु में जुड़ा होता या स्वयं बचाया होता तो उपयोगी होता।
अब घर वालों को उनके करने का न तो कारण ज्ञात है न अवसर लेकिन लकीर के फकीर की तरह उनको करना है, इसलिए करना है। पहले हल्दी आदि के उबटन से त्वचा चमक उठती थी, लेकिन अब सबसे पहले यह पूछा जाता है कौन से पार्लर से मेकअप कराया है या कौन सी ब्यूटीशियन आई है? अब सभी शुभदिन में ही विवाह करना चाहते हैं, इसलिए उस दिन ब्यूटीपार्लर में दुल्हनों की कतार रहती है। वैसे तो बरातें ही बारह-एक बजे पहुंचती है, उस पर दूल्हा और घर वाले बैठे दुल्हन का पार्लर से लौटने का इंतजार करते रहते हैं। अधिकांश निमंत्रित अतिथि तो खाना खा और शगुन देकर चले जाते हैं। बहुत कम लोग दुल्हन को देखने के लिए रूक पाते हैं। आज हर महिला अच्छे से तैयार होना, पहनना-ओढऩा जानती है और हर रस्म पर अलग-अलग साज-सज्जा। क्या यह हजारों रूपए की बरबादी नहीं कही जाएगी?
वैवाहिक कार्यक्रम में वरमाला के नाम पर भव्य सेट तैयार किया जाता है। यह एक तरह से मुख्य रस्म बन चुकी है, इसलिए इसकी विशेष तैयारियां की जाती हैं। वरमाला रस्म कम, तमाशा अधिक होती है। अधिकतर देखा जाता है कि वर अपनी गर्दन अकड़ा लेता है। शायद ऐसा करके वह अपनी होने वाली पत्नी पर रोब डालना चाहता है। मध्यवर्ग से अधिक मुश्किल उच्च मध्यवर्ग की है जिसे समाज में अपनी रईसी का झंडा गाड़े रखना है। शादी के निमंत्रण कार्ड के लिए भी लोग लाखों रूपए खर्च कर डालते हैं। जहां पांच-छह रूपए प्रति कार्ड की लागत से छपाई हो सकती है वहां लोग पचास-साठ से लेकर दो-ढाई सौ रूपए वाले कार्ड को प्राथमिकता देते हैं।
बिजली की बेहिसाब जगमगाहट और विशाल पंडाल की टनों फूलों से सजावट क्या यह सब आवश्यक है? जहां देश में बिजली का संकट गहराता जा रहा है, वहां इतना अपव्यय क्या ठीक है? डीजे, धमाल और बैंडबाजे ध्वनि प्रदूषण तो उत्पन्न करते ही हैं, उनकी धुन पर नाचते-थिरकते अक्सर हास्यास्पद भी लगते हैं। साथ ही बरात का शोर आसपास के बच्चों के पढऩे में व्यवधान बनने के साथ थके हुए उन लोगों के लिए जिनका उस शादी से कोई लेना-देना नहीं है, अप्रिय स्थिति पैदा करता है।
- नरेंद्र देवांगन

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