व्यंग्य: प्रेरणा अपनी अपनी

व्यंग्य: प्रेरणा अपनी अपनी

भाग्यशाली है वे जिनकी श्रीमती जी का नाम प्रेरणा है। उन्हें प्रेरणा के लिये कहीं भटकना नहीं पड़ता। जब चाहें, तब प्रेरणा प्राप्त कर लेते हैं।
समस्या उनकी है जिनकी पत्नी का नाम प्रेरणा न होकर कुछ और है। बगैर प्रेरणा के वे रचना कर नहीं सकते। रचना का प्रेरणा से गहरा संबंध होता है। घर के बाहर अगर प्रेरणा प्राप्ति के प्रयास करते हैं तो घर वाली के तेवर बदल जाते हैं। उस कलमुंही प्रेरणा में ऐसा क्या है जो मुझ में नहीं है।
कुछ रचनाकार प्रेरणा प्राप्ति की समस्या का सीधा हल खोज लेते हैं। वे अपनी श्रीमती का नाम जो कुछ भी हो, बदल कर प्रेरणा रख लेते हैं। मियां भी खुश और बीवी भी खुश, हींग लगी न फिटकरी, रंग भी चोखा आये।
कुछ रचनाकार घरवाली के तीखे तेवरों से घबराकर प्रेरणा की खोज छोड़ कर लेखन कर्म को अलविदा कह देते हैं। न रहे बांस, न बजे बांसुरी। रचना-वचना के गोरखधंधे से मुक्त होकर वे अपनी सारी क्षमता का उपयोग नून, तेल और लकड़ी में करते हैं।
मगर कुछ बिगड़ैल सांड भी होते हैं। उनका नारा होता है, हम नहीं सुधरेंगे। गृहस्थी रूपी खूंटे से इन्हें पत्नी रूपी रस्सी भी नहीं बांध पाती हैं। सरस्वती के ये वरद पुत्र नित्य नयी रचना के लिये नित्य नयी प्रेरणा प्राप्ति के चक्कर में यत्र तत्र सर्वत्र भटकते रहते हैं।
प्रेरणा प्राप्ति का दौर प्रारंभ होता है तो जाने कहां-कहां से प्राप्त होती है। कुछ को पत्नी से भी प्रेरणा प्राप्त होती है। राम जाने इसमें सच कितना है और भय कितना है? हो सकता है मिल जाती हो मगर शर्त यही है कि पत्नी नाम मात्र की भार्या न हो, भारी भी हो। तब भय से प्रीति और प्रीति से प्रेरणा प्राप्त भले ही हो ले।
कभी रचनाकार एक तीर से दो शिकार करता है। समर्पण कुछ इस तरह से करता है-उसकी प्रेरणा से जो पल प्रति पल मेरे साथ है, लीजिये साहब यह भी खुश, वो भी खुश।
कभी-कभी प्रेरणा बड़ी निष्ठुर हो जाती है। रचनाकार को एकाकी छोड़कर चली जाती हैं। इसे सामान्य भाषा में ठेंगा दिखाना कहते हैं। रचनाकार सरिता से रचना प्राप्त करे, तब तक वह कल कल करती चली गयी। तब उनके हृदय से पीर यूं उमड़ी मेरे जीवन में भी सरिता आयी थी जो कल कल करती चली गयी।
कुछ रचनाकार अपने परिवेश से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। ऐसे रचनाकारों की निगाहें, भिखारियों, रिक्शाचालकों, बूट पालिश करते बच्चे कप-प्लेट धोते मासूमों तन बेचती महिलाओं पर भी जाती है। झोंपड़पट्टियों में, पाइपों में और फुटपाट पर रैन बसेरा करते लोग इनके विषय बनते हैं
प्रेरणा का क्या कहिए, इलाहाबाद में किसी फूलबदन की कमी होगी और निराला प्रेरित हुए तो किससे।
वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
प्रेरणा है अपनी-अपनी, जिसे जहां मिल जाये।
-रमेश चन्द्र शर्मा

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