शराबी पति...बेचारी पत्नी

शराबी पति...बेचारी पत्नी

एक जमाना था कि शराब को समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। यदि कोई व्यक्ति भूलकर भी शराब पीकर किसी आयोजन अथवा समारोह आदि में चला आता तो समाज उसका बहिष्कार कर देता था किन्तु आज स्थिति विपरीत है। मदिरापान आज फैशन बन चुका है और इसके बिना विवाह या अन्य पार्टियां अधूरी समझी जाती हैं। कोई व्यक्ति इससे परहेज करता है या दूर रहने की कोशिश करता है तो उसका उपहास उड़ाया जाता है।
आज पूरे विश्व में शराब को सुख दुख का साथी माना जाता है। यही वजह है कि विश्व की लगभग पचास प्रतिशत जनसंख्या शराब की ओर उन्मुख हो गयी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में तीस से चालीस प्रतिशत युवा शराब के प्रेमी हैं जिनमें स्त्रियां भी शामिल हैं।
आजकल रंगहीन शराब यानी 'व्हाइट-रम' अथवा 'जिन' जैसी मदिराओं की मांग अधिक है क्योंकि इसे पीने से अधिक बदबू नहीं आती। चूंकि शराब में अल्कोहल होता है इसलिए इसके सेवन से नशा होना स्वाभाविक है किन्तु इसका असर सभी पर एक-सा नहीं होता। कोई थोड़ी पीकर बहक जाता है और कोई अधिक पीने के बावजूद होश नहीं खोता।
यह बात महत्त्वहीन है कि शराब पीने से स्फूर्ति व ऊर्जा मिलती है क्योंकि एक ग्राम शुद्ध अल्कोहल से सात कैलोरी ऊर्जा मिलती है। प्रत्येक 650 मिलीलीटर की बोतल में सत्तर प्रतिशत 'पू्रफ स्प्रिट' होती है जिसमें 240 ग्राम शुद्ध अल्कोहल होता है। इस हिसाब से एक बोतल अच्छी शराब से 1,680 कैलोरी मिलती है जो बहुत कम ऊर्जा है। अल्कोहल में वसा, प्रोटीन, विटामिन व शर्करा न होने से पोषण शक्ति नहीं होती, अत: इसका प्रभाव स्थायी नहीं होता और थोड़ी ही देर में शरीर ढीला व शिथिल-सा हो जाता है।
वास्तविक ऊर्जा प्रोटीन, वसा, शर्करा आदि से प्राप्त होती है। शराब की अधिकता से आंखें चढ़ जाती हैं। शायद इसीलिए शराब पीने के बाद कमजोर से कमजोर हृदय का स्वामी भी स्वयं को दुनियां का सर्वाधिक शक्तिशाली इंसान समझने लगता है। वह क्षणिक सूरमा सारे जमाने से लड़-झगड़कर जब अपनी आखिरी मंजिल यानी अपने घर पहुंचता है तो वहां उसका सारा गुस्सा व आक्रोश अपने परिवार, मुख्यत: पत्नी पर फूटता है।
आमतौर पर देखा गया है कि मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर होती है और जब पत्नी शराबी पति का ध्यान इस ओर इंगित करवाती है तो उसे उत्तर में गन्दी गालियां, तिरस्कार व मार-पिटाई के रूप में मिलता है। इस स्थिति में बेचारी पत्नी का घर से बाहर निकलना भी दूभर हो जाता है क्योंकि उसे लोग 'शराबी की पत्नी' होने का ताना देते हैं।
घर में बच्चे अभावों में रहते हैं और गृह-स्वामी अपनी कमाई शराब को सौंप देता है और पूर्ति न होने पर उधार भी लेना शुरू कर देता है। अंत में एक स्थिति आ जाती है कि उधार चुकाने के लिए कुछ नहीं बचता और घर के सामान बिकने लगते हैं। ऐसे में बेचारी पत्नी को काम की तलाश में घर से बाहर निकलना ही पड़ता है। तब यह निर्दयी समाज उसका तरह-तरह से शोषण करता है।
शराबी पति गैर-कानूनी कार्यों से धन जुटाता है और सस्ती व घटिया शराब पीने लगता है जो उसे अनेक प्राणघातक रोगों से जकड़ देती है। एक समय ऐसा भी आता है जब घटिया शराब की अधिकता शराबी में निराशा, रक्ताल्पता, उत्तरोत्तर कमजोरी, नपुंसकता, पेट व पैरों में सूजन कर देती है और शरीर पर मकड़ी की तरह रक्ताभ (लाल) चकत्ते पड़ जाते हैं। पेट की शिराओं में रक्तपात होने से रोगी बेहोश होने लगता है। अंतत: एक दिन बिना उपचार के वह तड़पते हुए अपने प्राण त्याग देता है।
ये किस्से मात्र मध्यवर्गीय परिवारों के ही नहीं, वरन् आज उच्चवर्गीय परिवारों में भी शराब अपना असर दिखा रही है। इन परिवारों में भी शराब के सैकड़ों दुष्परिणाम सामने आते हैं जैसे छोटे-बड़ों का आदर न होना, गृहस्वामी के मसरूफ रहने अथवा घर पर नशे में आने से ज्यादातर महिलाओं के कदम बाहर निकलना आदि।
शराब की खूबियां मात्र कवियों व लेखकों के दिखाये झूठे सब्जबागों के सिवा कुछ भी नहीं हैं। आज परिवार के सभी सदस्यों को शराब के खिलाफ एकजुट होने की आवश्यकता है। ऐसे में 'नशा मुक्ति केन्द्र' द्वारा सहायता ली जा सकती है। यदि शराबी फिर भी नहीं मानता तो परिवार के सभी सदस्य उसे प्यार से समझायें अन्यथा कोई निर्णायक फैसला लें।
- मनु भारद्वाज 'मनु'

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