दांपत्य में जरूरी हैं मर्यादाएं

दांपत्य में जरूरी हैं मर्यादाएं

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज के जिस समुदाय में जन्म लेता है, पलता, बढ़ता और शिक्षा प्राप्त करता है, उसके कुछ रीतिरिवाज और नियम कायदे होते हैं। स्त्री पुरूष दोनों को इनका पालन करना अनिवार्य होता है। इनमें कुछ रीति-रिवाज और नियम कायदे सार्वभौमिक होते हैं।
विवाह एक परम्परा है जो सभी समाजों में प्रचलित है। प्रत्येक लड़के तथा लड़की को विवाह करना होता है। विवाह किस विधि से किया जाय, यह उस समाज के रीति रिवाजों व नियम कायदों पर निर्भर करता हैं। विवाह की योग्यता और भावी वर वधू की आयु सभी समुदायों में भिन्न-भिन्न होती है। विवाह लड़के-लड़की तय करें या इसका उत्तरदायित्व माता-पिता निभाएं, इसमें भी भिन्नता है।
इतनी भिन्नताओं के बावजूद कुछ नियम ऐसे हैं जिनका पालन सभी समाजों में एक जैसा है जैसे:-
- लगभग सभी समाजों में विवाहित लड़की अपने पति के घर (ससुराल) जाती है।
- सभी विवाहिताएं ससुराल जाकर घर गृहस्थी के कार्य संभालती हैं।
- विवाहिता को पति की आज्ञाकारिणी होकर रहना पड़ता है।
- सभी पत्नियों से अपेक्षा की जाती है कि वे पतिव्रता होंगी और पति के सुख दु:ख में सहभागिनी बनेंगी।
- वे ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगी जिससे परिवार में अशान्ति हो।
विवाह की मर्यादाएं:-
भारत में, विशेषकर हिन्दू समाज में, विवाह एक संस्कार है, जन्मों-जन्मों का पवित्र बंधन है, इसीलिए विवाहित स्त्री-पुरूष को जीवन साथी कहा जाता है।
हिंदू विवाह में भी शर्ते होती हैं मगर ये मात्र फेरों तक सीमित रहती हैं अर्थात पुरोहित, फेरे लेते समय पढ़ कर सुना देता है। कोई सुने या न सुने, इस से कोई लेना देना नहीं होता। समाज भी इसकी तरफ कभी ध्यान नहीं देता कि पति-पत्नी इन शर्तों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
सब इन्हें मात्र एक औपचारिकता तथा कर्मकाण्ड मानते हैं किंतु इन शर्तों पर ध्यानपूर्वक अमल किया जाय तो कलह, दरार या मनमुटाव कम हो सकते हैं।
पति-पत्नी को केवल सेक्स का ही नहीं अपितु एक दूसरे के सुख दु:ख का साथी होना चाहिए। स्त्री को मात्र काम वासना तृप्ति करने की वस्तु नहीं समझना चाहिए। विवाह के पश्चात् जिस प्रकार शुक्राणु और डिम्बाणु मिलकर 'गर्भ' का रूप लेते हैं उसी प्रकार पति-पत्नी मिलकर दंपति बन जाते हैं।
दंपति दो शरीर मगर एक मन होते हैं। उन्हें परस्पर सहयोग, सहानुभूति और हर कार्य को सहभागिता के साथ निपटाना होता हैं। दोनों ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आने की आशंका होगी।
व्यावहारिक रूप में विवाह की मर्यादाओं का पालन करना कठिन होता है। इसके पांच कारण बताये जा सकते हैं:-
स्वाभाविक भिन्नता:- मनुष्य के कुछ तो जन्मजात गुणदोष होते हैं, कुछ को वह अपने परिवेश से अर्जित करता है। इन दोनों के योग से जिस मानसिकता का निर्माण होता है उसे हम व्यक्ति का स्वभाव या प्रकृति कहते हैं।
जब स्त्री-पुरूष कुछ समय साथ एक साथ रहते हैं तो ये गुण धीरे-धीरे प्रकट होने लगते हैं। विरोधी स्वभाव के स्त्री-पुरूष अपने आप को समायोजित नहीं कर पाते और उनके जीवन में महाभारत छिड़ता रहता है। इसके विपरीत गुण-दोषों का समायोजन करने वाले अपने जीवन को सुखमय बना देते हैं।
सेक्स के प्रति दृष्टिकोण:- इसमें भी भिन्नता होती है, स्त्री पुरूष दोनों में। कुछ स्त्री-पुरूष अधिक कामुक होते हैं तो कुछ कम। कुछ इसे मात्र सन्तानोत्पत्ति का साधन समझते हैं तो कुछ आनंद-प्राप्ति का। पुरूष स्वभाव से स्त्री की अपेक्षा अधिक कामुक होता है जबकि स्त्री की कामेच्छा को जगाना पड़ता है।
दांपत्य जीवन में दरार यौन असंतुष्टि से पड़ती है। स्त्री हो या पुरूष, अपने जीवन साथी से संतुष्ट न होने के कारण अन्य के पास जाना पड़ता है और यह वैवाहिक मर्यादा का सबसे बड़ा उल्लंघन माना जाता है।
सैद्धान्तिक भिन्नता:- प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ लक्ष्य, महत्त्वाकांक्षाएं व योजनाएं होती हैं। विवाहोपरान्त इसकी पूर्ति न करने पर दरार पड़ती है।
चुगलखोरी:- कुछ लोग दूसरों को सुखी देख नहीं सकते, इसलिए वे उस परिवार के सदस्यों की बुराई दूसरे सदस्यों के आगे करके उस परिवार में कलह का वातावरण पैदा कर देते हैं विशेषकर स्त्री-पुरूष के अन्दर।
अहम् का टकराव:- अहम् यानी स्वाभिमान स्त्री-पुरूष दोनों में होता है। स्त्री में प्राय: यह सुप्त अवस्था में पाया जाता है जबकि पुरूष में यह हर समय जागृत अवस्था लिये रहता है। पुरूष सदा से अपने को स्त्री से श्रेष्ठ और उसका स्वामी मानता आया है।
किंतु जब स्त्री पुरूष से अधिक शिक्षित, वेतनभोगी, धनसंपन्न मायके वाली, उच्च पदस्थ या समाज में प्रतिष्ठित होती है तो पुरूष की गुलामी, आदेशपालन तथा उसकी श्रेष्ठता को नहीं स्वीकारती। वह समानाधिकार की मांग करती है। ऐसे में दांपत्य जीवन में दरार पैदा हो जाती है।
दांपत्य जीवन में पति-पत्नी को चाहिए कि वे एक दूसरे की भावनाओं को समझें व जीवन में आने वाली कठिनाइयों का मुकाबला मिलकर करें। पुरूष हमेशा यह याद रखें कि स्त्री का दर्जा पुरूष से ऊंचा है। वह मां के रूप में, बहन के रूप में और पत्नी के रूप में अपने-आप को ढालती है। वह एक अनजाने परिवार में आकर अपने-आप को समायोजित करती है व करने की कोशिश करती है। ऐसे में पुरूष को उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। पत्नी अपने पति से यह अपेक्षा रखती है कि वह उसे समय दे, उसके सौंदर्य को निरखे, परखे व घण्टों उसके साथ बातें करें।
सेक्स तन की अपेक्षा मन से अधिक जुड़ा हुआ है जिसे दोनों गंदा कार्य न समझें, न मात्र संतानोत्पत्ति हेतु समझें बल्कि एक प्राकृतिक कार्य समझते हुए सहमतिपूर्वक निपटायें। दोनों एक दूसरे के लिये समर्पित जीवन जियें। छोटी-छोटी बातों को अन्यथा न लें। अग्निसाक्षी के आगे सात फेरों में ली गई प्रतिज्ञाओं का पालन करके 'दो तन-एक मन' होकर, अहम् को भुलाकर एक दूसरे को समझकर जीवन जियें तो वैवाहिक मर्यादाएं निभाई जा सकती हैं जिससे जीवन को सुखमय व रोमांचक बनाया जा सकता है।
- सांवला राम चौहान

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