जीतें प्यार से एक दूसरे का दिल

जीतें प्यार से एक दूसरे का दिल

वर्तमान में अधिकतर कपल व्यस्त हाइटेक लाइफ स्टाइल जीते हैं। दोनों ही सुबह से लेकर रात नौ बजे तक काम करते हैं। कुछ कई-कई दिन टूर पर ही रहते हैं जिसकी वजह से उनके पास अपने साथी के लिए वक्त नहीं होता। आजकल शादियां वीकएंड की तरह हो गई हैं और अगर इस बीच एक बच्चा आ जाए तो उसे लेकर सवाल खड़े हो जाते हैं कि वह किसकी जिम्मेदारी है, मां की या बाप की ? परिणामरूवरूप समय की कमी और वर्क लोड की वजह से छोटी-छोटी बातों पर तकरार शुरू हो जाती है।
रिश्तों को आपस में जुडऩे में काफी समय लग जाता है लेकिन टूटने में समय नहीं लगता। एक झटके में ही सब कुछ बिखर जाता है। जरा-सी चोट पहुंची नहीं कि शीशे की भांति संबंधों को चकनाचूर होते देर नहीं लगती। हमसे ऐसी कोई चूक हो जाती है कि हमारे हाथों से संबंधों की डोर छूट जाती है और इसका आभास हमें तब होता है, जब रिश्तों के खोने का दर्द ही शेष रह जाता है।
यदि हम समय रहते संभल जाएं तो इन अनमोल रिश्तों के टूटने का गम आंखों में सैलाब बनकर नहीं उमड़ेगा। दांपत्य रिश्तों का रंग कभी फीका न पड़े, इसके लिए पति-पत्नी दोनों को मिल जुल कर आपसी संबंधों की पकड़ मजबूत बनानी चाहिए। कुछ बातों का ख्याल रखा जाए तो वैवाहिक बंधन कभी भी टूटने के कगार तक नहीं पहुंचेगा।
शादीशुदा जिंदगी में आए तनाव के संबंध में एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक का कहना है कि वैवाहिक संबंधों में दरार आने का मुख्य कारण दो लोगों के बीच की एक्सपेक्टेशंस का मैच न हो पाना है। हम दूसरे से अपेक्षा तो करते हैं पर उसकी अपेक्षा पूरी करने की कोशिश नहीं करते। दूसरी वजह कम्यूनिकेशन गैप है। अपने दिल की बात मन में ही रखते हैं, साथी से खुलकर बातचीत नहीं करते जिसकी वजह से छोटी-छोटी बात पर गलतफहमियां पैदा होने लगती हैं।
पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के समकक्ष हैं। दोनों बराबर क्वालिफाइड होते हैं, एक जितना कमाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि आपका मूड खराब होता है। उस समय बेहतर यही होता है कि आप साथी से तकरार करने की बजाय यह सोचकर कि किसी कारणवश आपके साथी का मूड खराब हो सकता है, चुप रहने की कोशिश करें।
झगडऩे की बजाय हल्की-फुल्की बातचीत द्वारा एक दूसरे का मूड ठीक करने की कोशिश करें। अक्सर ऐसा होता है कि पति-पत्नी दोनों की ही बातें सही होती हैं पर वे एकदूसरे को अपनी जगह रखकर नहीं सोच पाते। अगर वे खुद को दूसरे की जगह रखकर सोचें तो समस्या स्वत: सुलझ जाएगी।
आपसी तकरार से बचने के लिए जरूरी है कि एक दूसरे की भावनाओं को समझें, अपनी समस्याओं तथा खुशियों के बारे में एकदूसरे को बताएं। शेयरिंग से आपसी संबंध मजबूत बनते हैं। जब आप अपने अच्छे-बुरे अनुभवों को एक दूसरे से बांटते हैं तो यकीनन आपके बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
आज के युग में पत्नी सिर्फ गृहिणी की भूमिका ही नहीं निभा रही। उसे घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों से निबटना पड़ता है। इसका प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से वैवाहिक जीवन पर पड़ता है।
कभी-कभी तनाव के कारण स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। जब क्रोध बनकर यही चिड़चिड़ापन प्रकट होता है तो कई समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में विवादग्रस्त परिस्थितियों से बचने के लिए एक कुछ पल के लिए केवल वक्ता बन जाए तो दूसरे को श्रोता बन जाना चाहिए। विवाद की गतिशीलता को रोकने के लिए यदि श्रीमतीजी बोले जा रही हैं तो श्रीमानजी को शांत रहकर घर के माहौल को ध्वनि प्रदूषण रहित रखने के लिए सहयोग देना चाहिए।
संबंधों की सजीवता के लिए पारस्परिक सहयोग पोषण का कार्य करता है। सफलता की सीढिय़ां चढऩे के लिए पति-पत्नी दोनों का सहयोग एक अनिवार्य कार्य में परिवर्तित हो जाता है। सफलता के आंकड़ों में पति-पत्नी के मध्य उन्नीस-बीस का अंतर आ भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है। सफलताओं के बही-खाते में नाम दोनों का ही दर्ज हो जाता है क्योंकि खाता तो साझा ही कहलाता है। मन के कपाट पर स्पर्धा, ईष्र्या जैसी भावनाओं का निषेध हो। इनके प्रवेश मात्र से ही आपस में मनमुटाव पैदा हो जाता है, संबंधों के मिजाज बिगडऩे लगते हैं।
पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखें। इसका अभाव रिश्तों को खलने लगता है। रिश्तों को कभी तुच्छ न समझें। रिश्तों के मध्य अहं की भावना नहीं होनी चाहिए। अहं से रिश्तों में घर्षण पैदा होता है, जिसके कारण छोटी-छोटी बातों को लेकर आपसी टकराव होने लगते हैं, जिसका असर शादीशुदा जिंदगी पर पड़ता है। वैवाहिक जीवन में अमन-चैन लुप्त हो जाता है और संबंधों को इतिश्री देने तक की नौबत आ जाती है।
शुरूआत में आकर्षण की वजह से पति-पत्नी परस्पर झगड़ों पर ध्यान नहीं देते पर धीरे-धीरे लडऩा-झगडऩा एक रूटीन हो जाता है पर इससे प्यार खत्म नहीं होता क्योंकि जहां जुड़ाव है, वहां टकराव तो होगा ही। दो लोग एकदम भिन्न-भिन्न वातावरण से आते हैं, अत: अलग पारिवारिक माहौल, संस्कृति और वैल्यूज से होने की वजह से एकदम नए वातावरण में ढलने में वक्त लगता है। धैर्य और समझदारी से इस स्थिति से बचा जा सकता है। इसका एक उपाय यही है कि समझौते के लिए तैयार रहें क्योंकि शादी कोई ऑफिस नहीं है जहां हर दम बॉस का शासन ही चलता है।
सच यह है कि पति-पत्नी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब वे अपनी समस्या और प्यार को एकदूसरे के साथ शेयर करते हैं तो फिर झुकने में हिचकिचाहट कैसी ? इतना याद रखें, जितना आप झुकेंगे, उतना ही पाएंगे और हरदम जीतते रहेंगे। इसलिए तू जो बोले हां तो हां, तू जो बोले न तो न ....... का फार्मूला अपनाएं। फिर देखिए, चित भी आपकी, पट भी आपकी।
- नरेंद्र देवांगन

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