रहस्य रोमांच: जहां नारी सुंदरता ही महत्त्वपूर्ण है

रहस्य रोमांच: जहां नारी सुंदरता ही महत्त्वपूर्ण है

मनोरंजन के लिए अतिथि कक्ष में रखे गये खिलौनों और तराशी हुई मूर्तियों की तरह नारी को भी काटने, छांटने और मनोरंजन का साधन बनाने के लिए उस पर कई तरह के अत्याचार किये जाते रहे
हैं।
उदाहरण के लिए चीन में किसी जमाने में लड़कियों को बचपन से ही पांवों में लोहे की जूतियां पहना दी जाती थी। आयु के साथ-साथ शरीर भी बढ़ता था और पांव भी परन्तु पांवों में लोहे के जूते कसे रहते थे जिससे उनके पांवों में अपार पीड़ा होती थी और उनका एक कदम चलना भी कठिन हो जाता था। इसका एक ही कारण रहा है कि चीन में जिस स्त्री के पांव जितने छोटे होते थे, उसे उतना ही सुन्दर माना जाता था।
बर्मा की एक पहाड़ी जाति पड़ाग में आज भी लम्बी गरदन को सुन्दर समझा जाता है। जिसकी गरदन जितनी लम्बी, वह उतना ही सुन्दर। इसके लिए लड़की जब सात आठ वर्ष की होती है तो उसके गले में एक के ऊपर एक अनेक पीतल के कड़े पहना दिये जाते हैं। ज्यों-ज्यों लड़की आयु के साथ-साथ बड़ी होती जाती है त्यों त्यों उसके गले में कड़ों की संख्या भी बढ़ा दी जाती है ताकि उसकी गरदन और लम्बी हो जाये। कोई स्त्री तो प्रकार पूर्ण यौवन प्राप्त करने तक लगभग 30-30 कड़े पहन लेती है।
मलेशिया की आदिम जातियों में लम्बे कान सुन्दरता के प्रतीक समझे जाते हैं। सुन्दर दिखाई देने के लिए यहां के लोग कानों में छेद करवा कर उनमें वजनदार बालियां पहन लेते हैं। इसमें उनके कानों का नीचे वाला हिस्सा लटक कर गरदन तक आ जाता है। कई स्त्रियां तो एक-एक किलो वजन की बालियां पहनती हैं।
अफ्रीका में लम्बे और मोटे होंठ सुन्दरता के प्रतीक समझे जाते हैं। वहां की लड़कियां चार-पांच वर्ष की होते ही अपने दोनों होंठों को कील से छिदवा लेती हैं। फिर उनमें लकड़ी के गोल टुकडे फंसा दिये जाते है। जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे-वैसे लकड़ी के गोल टुकड़ों के आकार को बढ़ाया जाता रहता है। इस प्रकार उनके होंठ इतने लम्बे हो जाते हैं कि वे तरल पदार्थों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खा सकती। किन्हीं-किन्हीं क्षेत्रों में तो बच्चों के होंठों से भारी-भारी चीजें लटका दी जाती हैं ताकि होंठ खिंचकर बड़े होते रहें।
मलेशिया के निवासियों की मान्यता है कि जिस स्त्री का सिर जितना चौड़ा और जितना चपटा होगा, वह उतनी ही सुन्दर और भाग्यशाली है इसलिए मां-बाप जन्म होते ही लड़की का सिर गरम पानी में भीगे कपड़े से तब तक बार-बार दबाते रहते हैं जब तक कि वह चपटा होकर गरदन के बराबर नहीं हो जाता। इसके बाद लड़की के सिर में लोहे का एक पहिया फंसा दिया जाता है। पन्द्रह वर्ष की आयु तक उसे अपने सिर में यह पहिया फंसाये रखना पड़ता है।
आस्टे्रलिया की आदिम जाति के लोग दांतों को कुरूपता की निशानी समझते हैं। वहां की स्त्रियों के दांत महज इसलिए तोड़ दिये जाते हैं कि वे सुन्दर लगें। लड़कियां किशोरावस्था को पार कर जैसे ही जवानी में कदम रखती हैं वैसे ही उनके दांतों की ठोक पीट आरम्भ हो जाती है। पहले छड़ी से मार-मार कर दांतों की जड़ें ढीली की जाती है और फिर पत्थर के टुकड़े ठोक-ठोक कर उखाड़ दिया जाता है।
वहां की जातियों में यह धारणा प्रचलित है कि जो स्त्री अपने दांत नहीं तोड़ती, वह अपने पति को खा जाने के लिए दांत रखती है। इगरोट जाति के लोग अपने दांतों को नुकीला और विशेष विधि से उन्हें काला कर देते हैं। उनका विश्वास है कि इससे सुन्दरता में चार चांद लग जाते हैं।
भारत की कई आदिवासी जातियों में गोदना गुदवाने की प्रथा है। इसके पीछे यह विश्वास है कि स्त्री सुन्दरता का आकर्षण और बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों के पांवों में बचपन से ही चांदी के कड़े और हाथ में बाजूबंद पहना दिये जाते हैं जिनके निशान जीवन हाथ पांवों मे पड़ जाते हैं। वजनदार चांदी की बेडिय़ां पहनने से कितना कष्ट होता है और चलने, फिरने में कितनी परेशानी होती है, कहा नहीं जा सकता। इसे भुक्त भोगी ही जान सकता है।
नारी को हमने अभी भी मानव नहीं माना है वरन् उसे एक सजी संवरी और रंगी-पुती गुडिय़ा बनाकर उसे मनोरंजक खिलौना बनाने में ही हमारी रूचि व प्रवृत्ति रही है।
- गिरीश शर्मा 'सागर'

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