बच्चों को बताएं गुड टच और बैड टच

बच्चों को बताएं गुड टच और बैड टच

हर औरत का भूतकाल अगर कुरेदा जाए तो उसमें न जाने ऐसे कितने वाकये, कितनी घटनाएं, दुर्घटनाएं सामने आयेंगी जिन्हें वह कभी किसी से शर्म के कारण बता नहीं पाई है। इसे औरत होने की सजा कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्यार और हवस में गहरा भेद है। जहां हर लड़की सच्चे प्यार के लिए तरसती है, मिलने पर अपना जीवन सफल मानती है, वहीं पुरूष, युवक, किशोर की हवस उसमें उनके प्रति सिर्फ घृणा उपजाती है। उसकी नियति है ऐसी घृणा से यौवन के प्रारब्ध, यहां तक कि बचपन में भी दो चार होना।
न जाने कितनी बच्चियां महज मां-बाप की लापरवाही के कारण बलात्कार की शिकार होकर जिन्दगी भर उसे हादसे की नारकीय पीड़ा को भूल नहीं पातीं। हमेशा माता-पिता लापरवाही के दोषी नहीं होते मगर यह भी सच है कि ऐसी घटनाओं को होने से रोका जा सकता था।
यह जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की है लेकिन औरत होने के कारण यह दायित्व मां का ज्यादा है। अपनी बेटी से उसका रिश्ता मां से ज्यादा अंतरंग सहेली जैसा होना चाहिए जिससे वह कोई बात छुपाए नहीं। ज्यादा रोकटोक और अनावश्यक डांट फटकार से महज दूरियां बढ़ती हैं, यह हमेशा याद रखें। कुछ बातें हर बढ़ती हुई बेटी के माता पिता के लिए ध्यान देने योग्य हैं, वे इस प्रकार हैं।
बच्ची का ऐसे स्कूल में दाखिला करवाएं जहां बस की व्यवस्था हो। यह व्यवस्था न होने पर जान-पहचान का रिक्शा टेंपो ही करें जिसमें आस पास के बच्चे जाते हों। बच्चे अक्सर पास पड़ोस में खेलने चले जाते हैं। अगर वे लोग विश्वसनीय हों, तभी बच्ची को उनके घर जाने दें। अगर आपको उस घर के लड़के या पुरूष पर जरा भी संदेह हो तो बच्ची को कदापि वहां न जाने दें।
बच्ची को चाहे नर्सरी के. जी. में पढऩे वाली ही क्यों न हो, कभी भी घर में किसी पुरूष के साथ न सुलाएं। बच्ची को अकेले छोड़कर जाना उचित नहीं। उसे साथ लेकर जाएं।
ऐसे कई मौके आ सकते हैं जब आपका बाहर जाना जरूरी हो और बच्ची की परीक्षा चल रही हो या वैसे ही पढ़ाई का हर्ज होता हो, आप अपनी बहन, मां, सास, बुआ या आपकी कोई विश्वसनीय सहेली हो तो उनके संरक्षण में बच्ची को उन्हें खास हिदायत देकर छोड़ सकती हैं।
लड़कियों को पर पुरूष के स्पर्श से दूर रहना सिखाएं। भले ही आज की सभ्यता में ये बातें दकियानूसी लगें लेकिन बेवजह-चाहे वह चाचा, मामा या उनके बच्चे जैसे नजदीकी रिश्तेदार हों या जीजा, मौसा, फूफा जैसे रिश्ते हों-किसी से चिपटना लड़कियों को शोभा भी नहीं देता और उनकी ऐसी हरकतें सामने वाले को उकसा सकती हैं और लड़कियों के लिए मुसीबत आमंत्रित कर सकती हैं।
घर के भीतर नौकर को कभी न घुसाएं। अगर फ्लैट में या छोटे मकान में रहती हों तो पुरूष नौकर भूलकर भी न रखें। हमेशा आया या महरी से ही कार्य लें। शॉपिंग के लिए लड़की को अकेले न भेजें, खासकर भरी दोपहरी में या उस समय जब सुनसान हो।
सैक्स को लेकर बच्चों में एक प्राकृतिक उत्सुकता होती है। सही वक्त पर, सही ढंग से जानकारी दी जानी चाहिए। अश्लील साहित्य, नंगी तस्वीरें घटिया किस्म की फिल्मी मैगजीन घर में भी न मंगायें। टी. वी. पर भी लड़कियों को सिर्फ हल्के-फुल्के मनोरंजक कार्यक्रम ही देखने दें।
आप स्वयं भी अश्लील, घटिया हॉरर सेक्स से भरपूर दिमाग को प्रदूषित करने वाले कार्यक्रम, फीचर फिल्म, सीरियल्स इत्यादि न देखें। आपकी भरपूर कोशिश यही रहे कि घर में एक स्वच्छ पवित्र खुशनुमा वातावरण रहे।
बच्ची के साथ आपका संवाद हमेशा बना रहे। घर में संवादहीनता की स्थिति कभी न आने दें। यह भी नहीं कि हमेशा बच्ची के सर पर सवार रहकर उसकी आजादी छीनें।
उमें ब्रीदिंग स्पेस जरूर दें क्योंकि किशोरावस्था में एक समय ऐसा भी आता है जब लड़कियां कुछ समय सपनों में अकेले विचरना पसंद करती हैं।
जैसे हर मां का स्वभाव, आचरण एक जैसा नहीं होता, बेटियां भी अलग-अलग स्वभाव व आचरण की होती हैं। कच्ची उम्र में उनसे परिपक्वता की उम्मीद नहीं की जा सकती। ये तो उम्र के तजुर्बों से ही हासिल होती हैं। यह एक नाजुक दौर होता है किशोरियों के लिए। भटकाव के लिए बाहर प्रलोभनों की कमी नहीं होती।
प्यार, इश्क, मुहब्बत एक कुदरती जज्बा है। उस पर किसी का वश नहीं लेकिन इसके अच्छे बुरे अंजाम से आप बेटी को परिचित कराना न भूलें क्योंकि आपको पता भी न चलेगा कब आपकी बेटी को यह रोग लग गया हो।
प्यार, जो कि इस उम्र में महज आकर्षण होता है, में पागल होकर लड़कियां क्या-क्या कर गुजरती हैं, यह अक्सर देखने, पढऩे व सुनने को मिलता है। कभी वे गलत हाथों में पढ ़कर इज्जत गंवा देती हैं, कभी जिस्म का धंधा करने पर मजबूर कर दी जाती हैं या किसी ऐसे पागल प्रेमी से दिल लगा बैठती हैं जो यह कहता है कि अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो किसी और की भी नहीं, और ठांय ठांय कर पहले प्रेमिका को मार डालता है, फिर खुद को।
यह आज के दौर में महज फिल्मी बातें नहीं रह गई। आज जो फिल्मों में हो रहा है, वही हकीकत में भी इसलिए जरूरी है कि बेटी में अच्छे संस्कार डालें, उसकी सही परवरिश करें, इस तरह कि न उसे कड़े अनुशासन के प्रति बगावत करने की जरूरत पड़े, न ऐसी आजादी मिले जो उसे भटका दे। बेटी की परवरिश में मां की लापरवाही अक्षम्य है। आखिर हर मां बेटी को खुश ही देखना चाहती है।
- उषा जैन 'शीरीं'

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