देह के पार भी नारी को देखें

देह के पार भी नारी को देखें

प्रख्यात सर्वोदयी नेता विनोबा भावे ने कहा था कि 'पुरूषों ने स्त्रियों के हाथ-पांवों में बेडिय़ां डाल दी हैं। इन्हीं बेडिय़ों के कारण स्त्रियां अकेले बाहर जाने से डरती हैं। पुरूषों ने स्त्रियों को डरपोक बनाया है। उनके नाक, गले, हाथ, पांव में सोने की बेडिय़ां डाल दी हैं ताकि वे पुरूषों के काबू में रहें। स्त्रियों को यह सब छोड़कर निडर बनना चाहिये'।
आजादी के बाद भारतीय महिलाओं में जिस परिवर्तन की आशा की गयी थी, पुरूषों ने उसमें अपनी दखलंदाजी कर उसे रोकने का काम किया है। आज हम यह नहीं कह सकते कि जो काम पुरूष कर रहे हैं, उसे महिलाएं नहीं कर सकती।
जो क्षमता पुरूषों में मौजूद है, उससे कहीं ज्यादा क्षमता महिलाओं में हो सकती है बशर्ते उसमें कोई दखलंदाजी न हो। पुरूषों ने अपने हिस्से में जो काम का बंटवारा किया है उसमें भी महिलाओं ने अपनी काबिलियत सिद्ध करने की कोशिश की है।
शल्य चिकित्सा में स्त्री डॉक्टर जो प्रयोग कर रही हैं, पुलिस की नौकरी में जिसे नये ढंग को लायी हैं, कला-संस्कृति में या जन कल्याण के क्षेत्रों में उन्होंने जो अपनी उपस्थिति दर्ज की है, वह कहीं से भी उनकी क्षमता पर संदेह पैदा नहीं करती है।
पुरूषों ने देह के पार नारी को कभी देखने की कोशिश ही नहीं की है। उन्हें तो पुरूष सत्तात्मक समाज की बात के अलावा कोई दूसरी बात नजर ही नहीं आती लेकिन विडम्बना है कि अभी भी यह प्रगतिशील सोच सिर्फ शहरों तक ही सीमित है। ग्रामीण क्षेत्रों में 45 प्रतिशत महिलाएं अभी भी सुविधाओं के अभाव में पुराने तरीके से जीने को विवश हैं। वे अभी भी पौराणिक बातों में विश्वास करती हैं और पुरूष की छांव से अलग रहने की बात सोच नहीं सकती। साक्षरता में अभी भी उनका प्रतिशत नाममात्र का है। केवल सरकारी आंकड़ों में उन्हें बराबर दिखाया जा रहा है। आज भी गांव की महिलाएं पुरूषों की नजर में पतिता, डायन और कुलटा नजर आती हैं।
आज महिलाओं को लेखिका सुश्री मारकुलीन के इस तर्क पर अमल करने की आवश्यकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि 'तर्क, बुद्धि, अपनी बात पर डटे रहना, इच्छाशक्ति और साहस ऐसे गुण हैं, जो जिन्दगी से जूझने के लिये जरूरी हैं।' महिलाओं को इन बातों पर अमल करने की आवश्यकता है।
कौन-सी ऊंचाई है जहां नारी चढ़ नहीं सकती? कौन-सा ऐसा स्थान है जहां वह पहुंची नहीं? हजारों अपराध करो, वह क्षमा कर देती है। जब वह किसी बात पर अड़ जाये तो संसार की कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती।
पुरूषों को भी महिलाओं को देखने के नजरिये में बदलाव लाना होगा। उन्हें कदापि नहीं भूलना चाहिये कि आज महिलाएं सभी क्षेत्रों में उन्हें चुनौती दे रही हैं। उनके प्रयास को नजरअंदाज करने के बावजूद वे अपना सिर खुद ऊपर उठा रही हैं।
- संजय कुमार झा

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