परिवार की धुरी है नारी

परिवार की धुरी है नारी

परिवार एक ऐसी संस्था है जहां प्यार, कर्तव्य और सहकार का निर्मल निर्झर निरंतर बहता रहता है जिसका स्रोत नारी होती है। नारी को स्वयं के प्रति अपेन चिंतन को बदल कर अस्तित्व के प्रति सजग होना चाहिये। नारी परिवार और परिवार के बाहर निरापद, मर्यादित और उल्लेखनीय कार्य कर सकती है । अनेक पेचीदा मामलों में वह उपयोगी सुझाव दे सकती है। कला, स्वास्थ्य, धार्मिक-वृत्तियों तथा नियमों के द्वारा सारे परिवार को सुसंस्कारों की पवित्र ज्योत्सना से जगमगा सकती है।
नारी अपनी कुदरती क्षमताओं समाज में एक अभिनव चेतना का संचार कर सकती है। वर्तमान समय में नारी को जो व्यापक स्वतंत्रता मिली है यदि उसका स्वछंदतापूर्वक उपयोग करने की बजाय विवेक सम्मत उपयोग किया जाय तो घर घर में उग रहे कलह और संस्कारहीनता के कंटीले झाड़ शांति और सदाचार के फूलों के गुलदस्ते में बदल सकते हैं और एक ठोस सामाजिक क्रांति का सूत्रपात हो सकता है। एक शिक्षित, सहिष्णु तथा शीलवती नारी के लिए कुछी सच्चा और अच्छा करना असंभव नहीं है।
रसोईघर जैसा महत्त्वपूर्ण तथा अनिवार्य विभाग नारी के पास है जिस पर भक्ष्याभक्ष्य विवेकहीन अपसंस्कृति का आक्रमण हुआ है। यदि नारी तेजस्वी तथा दृढ़ रहे तो किसी मजाल कि रसोईघर की पवित्रता को अघात पहुंचाए। इसके अतिरिक्त गृहिणी जिन भावों-विचारों के साथ भोजन तैयार करती है नारी को सदैव सद्भावों श्रेष्ठ विचारों एवं प्रसन्नता के साथ भोजन तैयार करना चाहिए।
किसी विचार ने कहा है, यदि आप एक पुरूष को शिक्षित करते हैं तो आपने सिर्फ एक पुरूष को शिक्षित किया है, किन्तु यदि आप एक नारी को शिक्षित करेंगे तो आप पूरिवार को शिक्षित करेंगे।
वर्तमान का दूषित वातावरण हमारी शिक्षा-पद्धति और संबंधित राजकीय-नीतियां भारतीय नारी की गरिमामय छवि को किता अक्षुण्ण रख पा रही है तथा रख पायेंगी, इसका निर्णय पाठक स्वयं करें और आत्म-चिंतन कर सही दिशा में कुछ करें- अपने घर से ही आज से, अभी से।
- उमराव देवी धींग

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