शिशु को साथ में सुलाने के बजाए अलग पालने पर सुलाना बेहतर

शिशु को साथ में सुलाने के बजाए अलग पालने पर सुलाना बेहतर

नई दिल्ली । बच्चों अपने साथ सुलाने के मामले में अभिभावकों की अपनी अपनी राय होती है हालांकि ये सवाल लोगों को काफी परेशान भी करता है। शोध की मानें तो जो नवजात बच्चे अपने अभिभावक के साथ सोते हैं, उन्हें सडन इन्फैंट डेथ सिन्ड्रोम होने का खतरा होता है। वैसे तो ये काफी रेयर है लेकिन कई केसेज में ऐसा होता है कि पैरंट्स नींद में बच्चे के उपर आ सकते हैं। अगर आप हल्की नींद में सोते हैं और अपने बच्चे के मूवमेंट को लेकर अवेयर हैं तो आप सेम बेड पर अपने बच्चे के साथ सो सकते हैं। आपके लिए सबसे अच्छा ऑप्शन बच्चे को अलग पालने में सुलाना ही है, यहां बच्चा बिना किसी दिक्कत के आराम से सो सकेगा। पैरेंट्स और नवजात बच्चे जो कि एक ही बेड पर एकसाथ सोते हैं वे ज्यादा करीब महसूस करते हैं क्योंकि वो एक ही स्पेस शेयर कर रहे होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चे अपने पैरेंट्स के साथ सोते हैं वे कॉन्फिडेंट और सेफ महसूस करते हैं। सिक्योरिटी की इस बढ़ती फीलिंग से बच्चा और पैरेंट्स में लगाव होता है जो कि पूरी जिंदगी भर चलता है। ये सुविधाजनक है क्योंकि अगर आप एक ही कमरे में अपने बच्चे को साथ सो रहे हैं तो ऐसे में बच्चे को दूध पिलाना ज्यादा आसान होता है क्योंकि इसके लिए आपको दूसरे कमरे में नहीं जाना पड़ता। बच्चे को साथ में सुलाना एक किफायती फैसला भी हो सकता है क्योंकि आपको अलग से पालना या बेबी मॉनिटर लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन इससे आपको कुछ असुविधाओं का सामना भी करना पड़ता है जैसे इससे आपकी सेक्स लाइफ पर असर पड़ सकता है और आप पूरी नींद भी नहीं ले पाएंगी क्योंकि आप पूरे समय बच्चे को लेकर सोचती रहेंगी।

इसके फायदे और नुकसान को देखते हुए आपको खुद ये फैसला करना है कि आपके लिए क्या बेस्ट है। वे पैरेंट्स जो अपने नवजात बच्चों के साथ एक ही बेड पर नहीं सोना चाहते और उन्हें अलग कमरे में भी नहीं सुलाना चाहते तो ऐसे पैरेंट्स के लिए सबसे अच्छा होगा कि वे बच्चे को पालने में अपने बेड के बगल में अपने ही कमरे में सुलाएं। इससे आप बिना किसी दिक्कत के बच्चे की मूवमेंट पर नजर भी रख सकेंगे और आपको किसी असुविधा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा। अगर आप अपने बच्चे के साथ सोना पसंद करते हैं तो तब तक उनके साथ सोएं जब तक कि वे खुद अलग न सोना चाहें। विशेषज्ञों के अनुसार 7-10 साल की उम्र से बच्चे में अलग सोने की नैचरल टेंडेंसी दिख सकती है। आखिर में अपने कॉमन सेंस का इस्तेमाल करें और क्योंकि सभी बच्चे एक जैसे नहीं होते और न ही हमेशा परिस्थिति भी एक जैसी होती है इसलिए अपने मन की बात सुनकर फैसला लें। अगर आप भी इस दौर से गुजर रहे हैं तो किसी भी डिसीजन पर पहुंचने से पहले इन बातों को ध्यान में रखें।

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