कब करता है पुरूष स्त्री का परित्याग

कब करता है पुरूष स्त्री का परित्याग

पुरूष की फितरत है कि अपनी नाकामयाबी का दोष मढऩे के लिये वह कोई ईजी टारगेट ढूंढता है और भला बीवी से ज्यादा सरलता से उसे और कौन उपलब्ध हो सकता है? स्त्री का प्रतिवाद उससे बर्दाश्त नहीं होता। कलह बढ़ते -बढ़ते अलगाव की स्थिति आ जाती है। कई बार स्त्री का जरूरत से ज्यादा धर्म में लीन रहकर पूजा पाठ करते रहना भी उसे ले डूबता है। इसी तरह औरत का उबाऊ और चिड़चिड़ा स्वभाव भी पुरूष को उसकी ओर से विमुख कर देता है। एक अन्य कॉमन कारण है स्त्री का बांझ होना। संतान की उत्कृष्ट अभिलाषा भी पुरूष के दूसरा विवाह करने का कारण है। दो औरतें एक छत के नीचे रह नहीं पाती। कलह से बचने के लिए पुरूष पहली पत्नी का परित्याग कर देता है। इन कारणों के अलावा कभी-कभी मजबूर होकर उसे पत्नी को छोडऩा पड़ता है। यदि धोखा-धड़ी से किये गये विवाह में स्त्री अद्र्ध विक्षिप्त हो, उसे मिर्गी के दौरे पड़ते हों या वह शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ हो और यह बात लड़की वालों ने विवाह पूर्व छुपा कर रखी हो। उपर्युक्त बातों से पता चलता है कि कई बार अपने परित्याग के लिए स्त्री स्वयं ही दोषी होती है। वह कुछ अपनी जुबान पर लगाम रखे, कुछ खर्चीली आदतों और बेवजह के शक और ईष्र्या पर काबू रखे तो उसका सुखी संसार उजडऩे से बच सकता है। पति का स्वभाव समझना उसके लिये जरूरी है। इसके लिये यूनिवर्सिटी की डिग्री नहीं चाहिये। ईश्वर ने औरत की छठी इंद्रिय बहुत मजबूत बनाई है। मानवीय स्वभाव को समझने की शक्ति उसमें पुरूष से ज्यादा होता हैै। पति को इरीटेट करने में कई स्त्रियों को बहुत मजा आता है। बात मजाक तक रहे तभी ठीक है। फिर गंभीर स्वभाव के पुरूष को, हो सकता है पत्नी की बातें कहीं गहरी चोट कर जाएं। सच पूछा जाए तो मन से पुरूष हमेशा एक बच्चे की तरह ही होता है। स्त्री जिसे ईश्वर ने कुदरती तौर पर उसे समझने और हैंडल करने में पूर्णत: सक्षम बनाया है, अगर अपनी क्षमता का अहसास रखते हुए पति के साथ जीवन गुजारे तो वह काफी हद तक छोड़े जाने के भय से मुक्त रह सकती है।

-उषा जैन 'शीरीं'

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