अभिशाप बनते छोटे परिवार

अभिशाप बनते छोटे परिवार

परिवार अथवा कुटुम्ब भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं परन्तु हाल के कुछ दशकों में कान्वेन्ट शिक्षा, छोटे परिवार पर जोर, आर्थिक आत्मनिर्भरता पर अत्यधिक ध्यान, धार्मिकता से दूर भागना आदि ने भारतीय संस्कृति में परिवार की अवधारणा को ही छिन्न-भिन्न कर दिया है।

इस परिवर्तित सोच के कारण आज परिवार एक प्राथमिकता नहीं रह गया है जिस कारण पारिवारिक रिश्ते एवं वैवाहिक जीवन बिखर से गये हैं। अपने व्यक्तिगत स्पेस के कारण आज का व्यक्ति किसी को भी अपने से ऊपर देखना नहीं चाहता। ऐसी सोच ने भारतीय युवाओं को एक तरह से भटका सा दिया है। इसकी वजह से युवा विवादग्रस्त और बैचेन से हो गये हैं।

इस बात की परम आवश्यकता है कि लोग रिश्तों को निभायें। रिश्तों के टूटने से भारी आघात लगता है तथा सभी का जीवन छिन्न भिन्न हो जाता हैं। तनाव, भटकाव आदि तो आम बात होती हैं। नौबत गंभीर, झगड़े, हत्या एवं आत्महत्या तक पहुंच जाती है। ऐसे में यह अत्यन्त आवश्यक है कि हर व्यक्ति रिश्तों के महत्त्व को समझें। उसमें बंधना एवं निभाना सीखें। रिश्ते आजन्म होते हैं। उनके महत्त्व को समझना चाहिए।

दूसरा यह कि पारिवारिक रिश्तों में प्यार, सदभावना एवं त्याग का भाव रहना चाहिए। इससे परिवार में सकारात्मक माहौल रहता है तथा आचार विचार भी ऊर्जापूर्ण रहते हैं। एक शोध में यह पाया गया है कि अगर कोई भारतीय अलग-थलग रहता है तो उसमें एक अधूरापन रहता है जिसके चलते जीवन एक अभिशाप के समान होता है।

छल कपट, ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाएं परिवार को तोडऩे की नींव रखती हैं। ऐसी नकारात्मक सोच से बचना चाहिए। जिस तरह संसार अथवा व्यापार में पब्लिक रिलेशन जरूरी होते हैं उसी तरह परिवार में भी रिलेशन जरूरी होते हैं। परिवार भी एक टीम की तरह होती है। जिस तरह एक टीम में सभी खिलाडिय़ों का अह्म रोल होता है उसी तरह परिवार में भी हर सदस्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रोल होता है। एक सदस्य की कमी से सारा परिवार ही भटक जाता है।

यह देखने में आ रहा है कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अथवा कान्वेन्ट-मिशन स्कूल में पढ़े लिखे युवक परिवार को कम महत्त्व देते हैं। आज के समय में अंग्रेजी कैरियर में लाभप्रद हो सकती है परन्तु अंग्रेजियत परिवार के लिए घातक सिद्ध हो रही है।

सकारात्मक सोच के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हर व्यक्ति भारतीय परंपराओं एवं भारतीय धर्म एवं दर्शन का अनुसरण करे। इसी के साथ ही साथ सामाजिक संबंध एवं परम्पराओं का भी सम्मान करे। इससे हर व्यक्ति में सकारात्मक सोच होगी तथा ऊर्जा का आगमन होगा जो उसे परिवार में जोडऩे में मददगार साबित करेगी। ऐसी सोच होने पर व्यक्ति परिवार, विवाह, बच्चों आदि के महत्त्व को पहचानेगा।

- कल्पना शर्मा

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