पहले नौकरी, फिर विवाह

पहले नौकरी, फिर विवाह

समाचार पत्र में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा करवाए गए एक अध्ययन से यह बात उभर कर आई है कि पिछले तीन दशकों के दौरान शादी की उम्र उन्नीस बीस से बढ़कर उनतीस तीस की परिपक्व उम्र तक पहुंच गई है। यह प्रवृत्ति न केवल भारत अपितु कई एशियाई देशों में भी देखने को मिल रही है।

दक्षिण एशिया में आमतौर पर महिलाएं विवाह के तुरंत बाद उन्नीस बीस साल की उम्र में मां बन जाती थी पर अब बदलाव की वजह है कैरियर के प्रति बढ़ती जागरूकता और अपने को सक्षम साबित करने की कोशिश। ज्यादा से ज्यादा महिलाओं ने रोजी रोटी कमाने के फैसले कर अपने परिवारों को सहयोग देने की भूमिका संभाल ली है जिस कारण शादी की उम्र बढ़ती जा रही है।

आखिर यह बदलाव कैसे और क्यों आया? विवाह प्रथम प्राथमिकता से दूसरे स्थान पर कैसे पहुंच गया। इसके कारणों की यदि जांच पड़ताल की जाए तो हम पाते हैं कि शिक्षा के प्रसार ने अपनी अहम् भूमिका निभाई है। पहले जहां परिवारों में लड़कियों को मुश्किल से स्कूली शिक्षा पूरी करा कर शादी की जिम्मेदारियों से बांध दिया जाता था, वहीं अब लड़कियां ऊंची तालीम प्राप्त करती हैं। आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं बचा है जिसके शीर्ष स्थानों पर वह न पहुंची हों। अच्छी शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी में भली भांति जम जाने तक अमूमन उम्र छब्बीस सत्ताइस के आसपास तो कभी इससे भी ज्यादा हो जाती है। कई बार पैंतीस चालीस के आसपास शादी करने के बारे में भी कुछ लड़कियां सोचती हैं।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शिक्षा के प्रसार ने उन्हें भावुकता भरे निर्णयों से बचाया है। पढ़ी लिखी समझदार लड़कियों की शादी मां बाप किसी से भी कर देने के पक्ष में नहीं होते। विवाह ही सब कुछ है, इस तथ्य में भी कितनी सच्चाई है, इससे लोग वाकिफ हो चुके हैं। अच्छी पढ़ी लिखी उच्च पद पर आसीन लड़की किसी से भी विवाह के लिए राजी हो जायेगी, अब ऐसी स्थितियां नहीं रही हैं। अब वह भी पुरूषों की तरह अपने जीवन साथी को चुनने में अपना मत देने लगी हैं।

यूं देखा जाए तो कोई स्त्री विवाह क्यों करती है या फिर उसे विवाह क्यों करना चाहिए, जैसे सवालों का जवाब सीधे सपाट शब्दों में यही होगा कि हमारे देश में यही मान्यता व परंपरा चली आ रही है कि स्त्रियों को बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए। वैसे तो सुरक्षा नाम की कोई चीज होती नहीं है परंतु उसे पाने के निमित फिर भी स्त्री के संदर्भ में विवाह को माना जाता है।

विवाह उसके लिए सोशल सिक्योरिटी है। सोशल सिक्योरिटी के लिए अच्छा बैंक बैंलेंस, एक घर, बीमारी वगैरह की स्थिति में हॉस्पिटल का बिल भरने का इंतजाम, सोशल स्टेटस के लिए कार, टी वी, कंप्यूटर, हाथ में मोबाइल और साथी जो सुख दुख में साथ निभाए, जरूरी होता है। यह सब तो अच्छी नौकरी मिलने पर स्त्री आज अकेले ही जुटाने की स्थिति में होती है। दो बच्चों की मां जिसके पति ने उसे तलाक दे दिया है या कोई दूसरी स्त्री को घर ले आया है, ऐसी परेशानियों और अकेलेपन से विवाह न करने का फैसला रखने वाली स्त्री ज्यादा सुखी है।

आज की स्त्री ने अपने से पहले वाली पीढ़ी की स्त्रियों की घुटन और उनके संघर्ष से काफी कुछ सीखा है। उसने समाज के अनुभव से यह जाना है कि विवाह के बाद उसकी राय नहीं पूछी जाएगी। आज वह अपनी राय रखती है और उसके पर्स में इतने रूपए तो रहते ही हैं कि वह बिना किसी की अनुमति मांगे अपने ऊपर खर्च कर सकती है। वो वर्तमान की जरूरतों को दांव पर लगा कर दहेज की साडिय़ां इकटठी नहीं करती।

शादी के बाद मिलने वाले अकेलेपन से वह बचना चाहती है क्योंकि वह यह मानती है कि संवादरहित शादी में रात भर करवटें बदलने से कही बेहतर है कि इंटरनेट पर किसी से देर रात तक चैटिंग कर टाइम पास कर लिया जाए।

इसके साथ ही औसत लड़की विवाह किसके लिए करती है, संभवत: इसका उत्तर सुरक्षा के बाद प्रेम होगा। आम भारतीय विवाहों में पहले विवाह और उसी से प्रेम हो जाता है, यह माना जाता है परंतु आज यह देखने में आता है कि प्रेम की तलाश शादी शुदा लोगों ने वैवाहिक संबंधों के बाहर शुरू कर दी है। साथ ही वे ये दलीलें भी देने लगे हैं कि प्रेम करने के लिए विवाह करना जरूरी नहीं है। संभवत: इन्हीं कारणों से लिविंग टुगेदर की अवधारणा समाज में बड़ी तेजी से बढऩे लगी है। पहले लड़कियां मां बाप का घर ससुराल जाने के लिए छोड़ती थी लेकिन आजकल अच्छी पढ़ाई के लिए होस्टल में रहना और अच्छी नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना एक आम बात हो चुकी है इसलिए शादी के बाद आने वाले परिवर्तनों को वह नौकरी के माध्यम से कुबूल करती है। नौकरी उसकी प्रथम प्राथमिकता स्वभावत: ही बन जाती हैं।

यही नहीं, लड़कियों ने स्वावलंबी होने के पश्चात अपने माता-पिता और भाई बहनों की जिम्मेदारियां भी निभाई हैं। जहां लड़के अपने कैरियर की चाह में विेदेश चल देते हैं वहीं बेटियों ने बेटों का स्थान लेकर विवाह को प्राथमिकता न देने के फैसले किए हैं।

स्त्री के रवैय्ये में आए बदलाव भले ही पुरूष मानसिकता को ठेस पहुचा सकते हैं परंतु स्त्री के विकास के मद्दे नजर एक व्यक्ति के रूप में अपनी इच्छाओं, अनिच्छाओं व महत्त्वाकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देने की दृष्टि से विवाह को दूसरे पायदान पर पहुंचना बेहद जरूरी था क्योंकि प्रथम प्राथमिकता में वह स्त्री के लिए पांव में बेडिय़ां और जुबान पर ताले की भूमिका के अलावा अधिक कुछ नहीं कर पाता, इसलिए यह समय की जरूरत है कि लड़कियां पहले अपना कैरियर संवारें, फिर विवाह करने के बारे में सोचें।

-एम. कृष्णा राव राज

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