प्यार में थोड़ा जरूर सोचें-समझें

प्यार में थोड़ा जरूर सोचें-समझें

आज प्यार और रोमांस एक-दूसरे के पर्याय बन गये हैं। प्यार की सच्चाई पर हम कोई सवाल नहीं खड़ा कर रहे हैं लेकिन आज की महानगरीय संस्कृति में मिली पश्चिमी सभ्यता, सैक्स और वासना की प्रधानता, प्यार के नाम पर हो रही निजी स्वार्थों की पूर्ति, इस तथ्य के सबूत हैं कि आज का प्यार पूरी तरह से रोमांस में बदल चुका है।

आज की प्रेमिकाओं में न तो कोई सीता है और न ही राधा या मीरा और न ही हीर, सोनी या लैला इत्यादि ही हैं। प्रेमियों में भी अब कोई राम, कृष्ण, चैतन्य, फरहाद, रांझा, महिवाल अथवा मजनू इत्यादि नहीं मिलते। भारत जैसे देश में जहां पहले जहांगीर और नूरजहां के प्रेम की कथाएं अमर होती थी, शाहजहां जैसे शहंशाह ने अपनी प्रेयसी मुमताजमहल की यादगार में प्रेम के अमर प्रतीक ताजमहल का निर्माण करवाया था जिसे आज विश्व का सातवां आश्चर्य माना जाता है परन्तु आज कोई प्रेमी अपनी प्रेयसी की याद और अमर प्रेम के प्रतीक के रूप में ताजमहल का निर्माण नहीं करवा सकता।

मैं यह तो नहीं कहता कि आज दुनियां में सच्चा प्यार करने वाले नहीं हैं। दर्जनों युगल आज भी अमर और सच्चे प्यार की पवित्रता को बरकरार रखें हुए हैं। आज भी अनेक प्रेमी युगल लगातार संग-संग जीते मरते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनियां में अमर-प्रेम आज भी जिंदा है।

परन्तु आज डिस्कोथेक, बीयर बारों, पार्टी, सिनेमाघरों कैबरों, स्कूल, कॉलेजों और पिकनिक एवं नदियों के किनारे युगल जोड़े मदमस्त होकर थिरकते, घूमते-गाते-नाचते देखे जाते हैं, वह क्या सच्चा प्यार है? नहीं, आज के प्यार में वासना और निजी स्वार्थों का मिश्रण हो चुका है जो प्यार से बदलकर रोमांस का रूप धारण कर चुका है।

इसका प्रतीकात्मक रूप हर महानगर, शहर और कस्बों में देखा जा सकता है। प्यार एक तपस्या है, एक साधना है। सच्चे प्यार में त्याग और पवित्रता होती है। उसमें वासना और निजी स्वार्थों का कोई स्थान नहीं होता। सच्चा प्यार लेना नहीं, देना सिखाता है। आइये हम रोमांस छोड़कर सच्चा प्यार करना सीखें।

-दुर्गा प्रसाद शुक्ल 'आजाद'

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