सूखने न दीजिये प्यार की बेल

सूखने न दीजिये प्यार की बेल

अक्सर होता है कि विवाहित जीवन की सारी मधुरता व अंतरंगता कड़वाहट में घुल जाती है। रह जाती है एक गहरी ऊब और मानसिक यंत्रणा। जब भी मुंह खुलता है घर में सिवा किच-किच, ताने, आरोप प्रत्यारोप, दोषारोपण के सिवाय किसी और बात के लिये नहीं। हां, कारोबार या दुनिया की बातें तो होती ही हैं लेकिन उसमें भी मिठास नहीं होती।

साथ कोई साजो सामान न हो तो सफर आसान होता है। यही हाल मन का है। मन भी रीता रहे तो सफर आसान है लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? ऐसा होना मुमकिन है? लड़ झगड़ कर कड़वाहटों से भला मन रीता होता है? हां, मोहभंग जरूर हो जाता है। मोहभंग होने की स्थिति त्रसद जरूर होती है लेकिन इसका प्लस पॉइंट भी है, वह है जिजीविषा का खत्म होना।

दो व्यक्ति एक छत के नीेच रहेंगे तो आपसी मतभेद तो होंगे ही। भटकाव के मौके भी आएंगे। अपेक्षाएं पूरी नहीं होगी। ऐसे में होता क्या है। एक दूसरे को समझ न पाने के कारण अक्सर गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं जिसके परिणाम में वे सारी नकारात्मक बातें सिर उठा लेती हैं जो प्यार की जड़ काटने के लिए काफी होती हैं। अक्सर एक दूसरे से चिढ़ व खीझ का कारण व्यक्तिगत दोष न होकर बात करने का गलत तरीका, गलत मुद्रा व शब्दों का गलत प्रयोग होता है। बात बढ़ती जाती है। सामयिक मेल मिलाप के बाद स्थिति फिर जस की तस होने लगती है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रकृति ने स्त्री पुरूष दोनों की मानसिक रचना भिन्न प्रकार से की है।

उनके टेंपरामेंट में फर्क होता है, तदनुसार उनकी बातों पर प्रतिक्रि या भी भिन्न रहती है। अगर स्त्री पुरूष की फितरत समझ ले और पुरूष स्त्री की तो उनके आपसी तालमेल के लिए सहायक सिद्ध होगा। आज के स्त्री पुरूष की बराबरी के युग में यह बात ज्यादा ध्यान देने योग्य है।

प्यार की जीवन में कितनी अहमियत है इसे पहचानिए। बात बार-बार दोहराई जाने पर भी जैसे नजरअंदाज कर दी जाती है। जीवन बस एक ढर्रे में चलता रहता है जहां सिर्फ उलझनें, परेशानियां, ख्वाहिशें और अपेक्षाएं भर रहती हैं। इसके साथ ही दबी हुई कुंठाओं, क्षुब्धताओं, क्रोध, नकारात्मक भावनाओं के निकास के लिये सबसे सरल निशाना होता है। जीवनसाथी उम्रदराज होने पर ये सभी बातें अपने चरम पर होती हैं।

क्यों होता है ऐसा कि हम अपने ही प्रिय के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उसके साथ जो हमारे लिये क्या कुछ नहीं करता। यह सोचने समझने की बात है। यह सब आपके चश्मे के प्लस नंबर का कुसूर है। दृष्टि व्यापक रखेंगे तो बेहतर देख सकेंगे। एकाधिकार एक और भूल है। आपका साथी व्यक्ति है, बेजान वस्तु नहीं। संवादहीनता भी दूरियां बढ़ाती है।

एक दूसरे की भावनाओं को समझने के लिए संप्रेषण निहायत जरूरी है। शको-शुबहे की इस रिश्ते में कहीं गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। शिष्टता, संवेदनशीलता, सद्व्यवहार सिर्फ औरों के साथ वाहवाही के लिए ही न बरतें। इसकी जरूरत घर में ज्यादा है। रोमांस के बिना जीवन फीका नीरस हो जाता है। इसे अपने जीवन में भरपूर जगह दें।

-उषा जैन शीरीं

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