क्या आपकी शादी होने वाली है?

क्या आपकी शादी होने वाली है?

नई नवेली बहू के आगमन की प्रतीक्षा हर मां-बाप को होती है पर बहू कैसी होगी, सबको साथ लेकर चलेगी या छोड़ देगी, इसी उधेड़बुन में पूरा परिवार परेशान रहता है। आदर्श बहू वही है जो अपने कर्म और वाणी से कुछ ही दिनों में पूरे परिवार में अपना में आधिपत्य जमा लेती है। अगर आप नई नवेली बहू हैं और आप चाहती हैं ससुराल पक्ष का दिल जीतना तो मुश्किल क्या है।

ससुराल में कदम रखते ही नई बहू की धड़कनें बढ़ जाती हैं, दिल सहम जाता है और मन में तमाम प्रकार की आशंकाएं घर बनाने लगती हैं कि पता नहीं, नया परिवार मुझे स्वीकार करेगा कि कहीं सब गलती ढूंढने में तो नहीं लग जायेंगे। फिर भी आशंकाओं के डर से नये संबंध बनाने से रुका तो नहीं जा सकता। तो चलिए, कुछ ऐसे सूत्र तलाशें जिनसे बेहतर संबंधों की नींव रखी जा सकें।

खुलकर मिलें:- हर परिवार की चाहत होती है एक प्यारी सी बहू की जो उनसे घुल मिलकर रहे, उनके साथ अपनी बातें बांटें ताकि अपनापन महसूस हो। आखिर चुप्पी साधकर बैठी या सिर्फ हां-न में जवाब देने वाली बहू किसके मन भायेगी। शुरूआत में ही रंग जमाने का बेहतर तरीका होगा अपनी राय व्यक्त करना, बच्चों की शरारतों में भाग लेना, सास-ससुर से उनके अतीत की बातें करना इत्यादि। हां, विवादास्पद मामले न छेड़ें जिनमें बहस होने की आशंका है। पारिवारिक झगड़ों में भी तब तक हस्तक्षेप न करें जब तक आपकी राय न मांगी जाये।

पति को बनाये केंद्र: यह तो मानकर चलिए कि आपके पतिदेव, अपने माता-पिता की आंख के तारे हैं। जितना आप उनके बारे में अच्छी बातें करेंगी, सास-ससुर उतने ही प्रसन्न होंगे। हर माता पिता की नजर में उनका बेटा राजा बेटा होता है। कोई भी मां अपने बेटे की बुराई बर्दाश्त नहीं कर सकती। ऐसे में आप भी बड़ी समझदारी करते हुए पति की तारीफों के पुल बांधने में जुट जाएं। पति के आराम व उनकी पसंद नापसंद का ख्याल रखें।

तालमेल आवश्यक: हर परिवार के अपने सिद्धांत और मान्यताएं होती हैं। उसी के साथ यह आकांक्षा भी होती है कि नयी बहू भी इन रीति-रिवाजों को माने, सिद्धांतों का आदर करे। अब यह अलग बात है कि आपने अपने जीवन का एक चौथाई हिस्सा अपने परिवार की मान्यताओं को सहेजते हुए जिया है। ऐसे में नये सिद्धांत एकदम से गले नहीं उतरते पर शुरूआत में ही उनकी जड़ खोदने में जुट जाना संबंध बिगाडऩे और मुसीबत को बुलावा देने के समान है। अगर आप किसी मामले में ससुराल वालों से असहमत भी हैं तो भी उनकी बात रख लें। जब मधुर संबंध बन जाये, तब अपना पक्ष समझा कर काम बनायें।

शालीनता जरूरी: ससुराल में पति का ध्यान रखना, उनकी बातें करना तो ठीक है पर शालीनता की सीमा को सदैव ध्यान में रखें। आखिर वे सिर्फ आपके पति ही नहीं है। उस घर के बेटे भी हैं। अपने घर वालों के बीच में आपको हर समय ताकते या आगे पीछे घूमते नहीं रह सकते क्योंकि उनकी अपनी मर्यादा है। बेहतर होगा कि उन्हें चैन से बेटे की भूमिका निभाने दें। इसके बाद जब वे पति की भूमिका में लौटेंगे तो जिंदगी कहीं ज्यादा गर्मजोशी भरी होगी।

- दुर्गा प्रसाद शुक्ल

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