घरेलू झगड़े और आप का दायित्व

घरेलू झगड़े और आप का दायित्व

जहां दो बर्तन होते हैं, उनमें टकराने की आवाज़ आती ही है। ऐसा बिलकुल संभव नहीं कि दोनों से आवाज न आए। हमारे समाज में देखा गया है कि दिन-प्रतिदिन घरेलू झगड़े होते ही रहते हैं।

मनुष्य का स्वभाव एक-दूसरे से अलग होता है। आज संयुक्त परिवार का चलन समाप्त हो रहा है। आधुनिक जीवन जीने की शैली भी लड़ाई-झगड़े का एक कारण है। वैसे बढ़ती हुई बेरोजग़ारी, महंगाई, पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध, नैतिक गिरावट और आय से अधिक खर्च भी झगड़े के मुख्य कारण हैं। हमारी युवा पीढ़ी में दौलत की चमक-दमक, भौतिकवाद और सदाचार की गिरावट की वजह से घर का चैन-सुकून खत्म हुआ है।

युवा पीढ़ी की सही देखभाल नहीं हो पाने के कारण बड़ों के प्रति आदर का भाव कम हो रहा है। जब बड़े ही आपस में लड़ेंगे तो बच्चों पर असर पडऩा स्वाभाविक है। यही बच्चे बड़े होकर वही करते हैं जो बड़ों को करते देखते हैं। युवा पीढ़ी बहुत जल्द गुमराह हो जाती है और इससे अनेक प्रकार के झगड़े जन्म लेते हैं।

लड़कियां जो दूसरे के घर ब्याही जाती हैं, वहां उनका वास्ता सास, ननद, देवर व भावज आदि से पड़ता है। सबकी सोच, तमन्ना और चाहत अलग-अलग होती है जो किसी तरह पूरी नहीं हो पाती जिसके कारण विवाद उत्पन्न होते हैं। सास, ननद, देवर और भावज का कर्तव्य है कि वे आपसी समझदारी से इसे सुलझाएं और घर में आने वाली पराई लड़की को अपने घर का एक सदस्य समझें। उसके साथ पराये जैसा बरताव करने से घर का चैन-सुकून खत्म हो जाता है क्योंकि वास्तव में वह घर का एक अंग ही है। मनुष्य कभी भी अपने किसी अंग को कष्ट नहीं पहुंचाता तो आने वाली पराई लड़की के साथ दुर्व्यवहार क्यों जबकि वह परिवार का अंग बन चुकी है।

घर में शांति बनाए रखने की जि़म्मेदारी केवल सास, ससुर, देवर, ननद पर ही नहीं है बल्कि इसका अधिक से अधिक दायित्व आने वाली बहू पर भी है कि वह इस नये घर को किस तरह अपना घर समझती है, किस तरह अपने पति से प्यार और उसकी चाहतों का सम्मान करती है। उसके साथ-साथ अपने देवर और ननद के साथ उसका स्वभाव किस प्रकार का रहता है।

अगर लड़की के मां-बाप ने सही ढंग से शिक्षा-दीक्षा दी है तो लड़की नये घर में जल्द ही घुल-मिल जाएगी लेकिन कुछ लड़कियां पहले से ही मिजाज बनाकर आती हैं कि उन्हें नये घर पर नियंत्रण करना है और किसके साथ किस तरह का सलूक करना है, किस तरह से ईंट का जवाब पत्थर से देना है। उनका दिल-दिमाग समर्पण की भावना से रहित रहता है। परिणाम होता है पहले ही चरण में मन-मुटाव और फिर लड़ाई-झगड़े शुरू।

अगर घर में कोई बिगाड़ है तो उसे अक्लमंदी और होशियारी से ठीक किया जा सकता है। अगर महिला चाहे तो घर को स्वर्ग बना सकती है, चाहे तो घर को नर्क बनाकर तबाही व बदनामी के कगार पर ला खड़ा कर सकती है। इस आधुनिक युग में माता-पिता का भी दायित्व है कि वे बच्चों को दोष का अहसास दिलाएं। अगर दोषी का रवैय्या अडिय़ल हो तो सख्ती से पेश आएं। कई घर इन्हीं छोटे-मोटे झगड़ों की वजह से उजड़ जाते हैं। सुहागन का सुहाग उजड़ जाता है। ये मामूली झगड़े बढ़ते-बढ़ते तलाक तक की नौबत आ जाती है।

लड़की के घरवालों को चाहिए कि झगड़े को आगे न बढ़ाएं, हठधर्मी और अडिय़ल रवैय्या न अपनाएं वर्ना दो घर तबाह हो जाएंगे। जहां तक हो सके, धैर्य और समझ से काम लेना चाहिए। दो घरों की बर्बादी में आपसी नासमझी का बहुत हद तक दखल होता है। दोनों घरवालों को यह देखना चाहिए कि झगड़े का प्रभाव कहां-कहां पड़ेगा।

प्राय: यह देखा गया है कि पति-पत्नी की हठधर्मी ही जीवन को नर्क बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की भावना ने सुखमय जीवन में जहर घोल दिया है। कर्म, संतोष, समर्पण, कुर्बानी देने की भावना जो महिलाओं का आभूषण समझी जाती थी, उसे आज की महिलाओं ने अयोग्य अंग की तरह निकाल बाहर किया है।

इसमें कतई दो राय नहीं हो सकती कि महिला पुरूष के बिना और पुरूष महिला के बगैर नहीं रह सकते, फिर एक-दूसरे के खि़लाफ यह जहर क्यों? घर में प्रसन्नता और वैभव का राज तभी हो सकता है जब पति-पत्नी एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे। एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करें। पति-पत्नी जीवन के दो पहियों के समान हैं। अगर उसमें से एक भी पहिया सही ढंग से काम करना बंद कर दे तो जीवन की गाड़ी नहीं चल सकती।

घरेलू झगड़े का एक मुख्य कारण यह भी है कि लड़की के दिलो-दिमाग में यह धारणा बैठ जाती है कि सास जालिम होती है या ननद झगड़े कराती है। जब वह ब्याह कर ससुराल पहुंचती है तब या तो वह डरी-सहमी रहती है अथवा इस तरह बात करती है जिससे घर का माहौल बद-से बदतर हो जाता है। अगर लड़कियां चाहें तो अपने घर को स्वर्ग का नमूना बना सकती हैं। तमाम लड़ाई-झगड़े को प्यार-मोहब्बत से सुलझा सकती हैं। उनकी एक मुस्कुराहट पर तो पति अपनी जान तक न्यौछावर कर सकता है।

प्यार-मोहब्बत, अपनापन और वफ़ादारी की भावना अगर लड़कियों के अंदर हो तो नोंक-झोंक को छोड़कर कभी लड़ाई नहीं होगी। जो घर प्यार-मोहब्बत से परिपूर्ण होता है, वहां पैदा होने वाले बच्चे बुद्धिमान, होशियार और हर मैदान में तेज होते हैं तथा देश, राष्ट्र का नाम रोशन करते हैं परन्तु जिस घर में आए दिन झगड़े होते रहते हैं, उस परिवार के बच्चे अपराध की दुनियां में अपना नाम कमाते हैं। वे गलत संगत में पड़कर सही रास्ते से भटक जाते हैं। गैर-कानूनी काम करते हैं और नशीली दवाओं आदि के सेवन और धंधे में लिप्त हो जाते हैं या फिर प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ जाते हैं।

इसलिए महिलाओं की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे घर को अखाड़े का मैदान न बनाएं। अपने घरों में झगड़ों से विशेषकर बच्चों के सामने झगडऩे से परहेज़ करें क्योंकि बच्चे माता की गोद में पलते हैं और माता-पिता की छाया तले परवान चढ़ते हैं।

-मुसर्रत परवीन

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