पत्नी व मां के बीच पिसता युवक

पत्नी व मां के बीच पिसता युवक

सास-बहू का झगड़ा तो जगजाहिर है लेकिन इनके झगड़े में लड़के का हाल बहुत खराब होता है। दो पाटों के बीच में बेचारा लड़का पिसता रहता है। अगर वह बीवी का पक्ष लेता है तो मां से ताने मिलते हैं कि लड़का जोरू का गुलाम हो गया है। अगर वह मां का पक्ष ले तो पत्नी कहती है-जिन्दगी भर दुधमुंहे बच्चे की तरह मां का आंचल ही थामे रहोगे। ऐसी स्थिति में पारिवारिक जीवन नारकीय हो जाता है।

ऐसे में अक्सर परिवार वाले बहू को ही दोष देते हैं लेकिन ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। लड़की जब विदा हो कर ससुराल आती है तो पति ही उसका सब कुछ होता है लेकिन पति से ही पति के मां,बाप, भाई, बहिन आदि जुड़े होते हैं जिन्हें बहू द्वारा उचित सम्मान व प्रेम मिलना चाहिये कि एक लड़की अपना घर बार छोड़कर नये संसार में प्रवेश कर रही है तो उसे आपके पारिवारिक माहौल से सामन्जस्य स्थापित करने में वक्त तो लगेगा ही।

ऐसे में उससे जल्दी ही जिम्मेदारियों को निभाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। उसके कामों में मीन मेख निकालने के बजाय उसका सहयोग करना चाहिए एवं गलती होने पर प्यार से समझाना चाहिये। सास को यह सोचना चाहिये कि जब वह विदा होकर अपनी ससुराल आई थी तो तुरन्त ही घर गृहस्थी के कार्यों में निपुण नहीं हो गयी थी।

बेटे से यह शिकायत करना कि वह अपनी मां का पहले जितना ख्याल नहीं रखता, भी ठीक नहीं है क्योंकि विवाह के बाद अपनी पत्नी के प्रति आकर्षण भी स्वाभाविक है। लड़के की जिम्मेदारियों में शादी के बाद उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और फिर यदि वह ही अपनी पत्नी की समस्याओं व परेशानियों को नहीं सुनेगा, उनका निदान नहीं करेगा तो कौन करेगा?

सास और बहू के झगड़े में लड़का ही तनाव कम करने की कोशिश करता है वह एक मध्यस्थ का कार्य करने पर विवश होता है तो स्वाभाविक है कि वह अपनी पत्नी का पक्ष भी स्पष्ट करेगा? इस पर यदि उसे 'जोरू का गुलाम' जैसी संज्ञा दी जाये तो यह सरासर अनुचित है।

- आलोक चौबे

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