सिंगल मदर्स: एक नया प्रचलन

सिंगल मदर्स: एक नया प्रचलन

भावनाओं का ऐसा सुहाना, मधुर आदान-प्रदान जो एक मां और उसके बच्चे में होता है, उसकी कोई मिसाल नहीं। शायद इसीलिए प्रकृति उन्हें एक दूसरे से अंतरंगता से जोड़े रखती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक नेक काम है। किसी भी अनाथ बच्चे की परवरिश के साथ उसे प्यार, ममता का अहसास देकर उसका जीवन संवार देना भलाई का ऐसा कार्य है जिसमें बच्चे के साथ ही पालने वाले वाली मां का जीवन भी खुशियों से भर जाता है। इसीलिए आज समाज में इस प्रचलन को मान्यता प्राप्त है। अब इसे कोई नीची निगाह से नहीं देखता और न ही कोई तरस खाने की हिम्मत करेगा। नारी की सक्षमता का भी इसके पीछे हाथ है। वह खुद कमाती है और बच्चे का खर्च उठा सकती है। ऐसे केस में बच्चों के नालायक निकलने के चांस कम होते हैं। बच्चा कहीं न कहीं एक अहसान के भार तले हमेशा दबा रहेगा। बायलॉजिकल संतान कई बार मां बाप की आगे चलकर उपेक्षा करने लगती है। मां बाप के कुछ कहने पर पलट कर वार करते हुए कहती है, 'तुमने हमारे लिए जो भी किया, वो तुम्हारा फर्ज था। सभी मां-बाप अपने बच्चों के लिए ये सब तो करते ही हैं। हम भी अपने बच्चों के लिए करेंगे। इसमें अनोखा क्या है?' गोद लिये बच्चे ऐसे जुमले नहीं कहते। अपशब्द हर जगह हैं मगर एक सच यह भी है कि परवरिश का, दिये गये संस्कारों का बच्चे पर बहुत प्रभाव पड़ता है। सिंगल मदर्स को कई बार कुछ खास दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, मसलन स्कूल एडमिशन के समय फॉर्म में पिता का नाम लिखना या अजनबियों द्वारा पिता के बारे में पूछा जाना। तब स्त्री को बोल्ड होकर उन बातों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए चूंकि बच्चा गोद लेना उसका निजी निर्णय था। अपनी खुशी तृप्ति के लिए ही उसने बच्चा गोद लिया है और वो भी कानून के घेरे में रहकर। कहते हैं मां बनना आसान है लेकिन उसके कर्तव्यों का पालन करना कठिन है। बच्चे की खातिर अपना बहुत कुछ भूलना पड़ता है। बहुत-से त्याग करने पड़ते हैं। तभी आप बच्चे को एक सुखद बचपन देकर मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तित्व प्रदान कर पाती हैं। किसी भावनात्मक आवेग के तहत बच्चा गोद न लेकर अच्छी तरह सोचें विचारें। उन जिम्मेदारियों को, जो बच्चे के साथ जुड़ी हैं, इन्हें ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लें। यही मां और बच्चे के हक में सही होगा।

- उषा जैन शीरीं

Share it
Top