बुरी बात है चुगलखोरी

बुरी बात है चुगलखोरी

जाने या अनजाने में पक चुकी चुगलखोरी की लत आदमी को कहीं का नहीं छोड़ती। यों औरतों पर तो चुगलखोरी का लांछन लगाया ही जाता है मगर पुरूष भी अपनी कलाकारी दिखाने में पीछे नहीं लगते।

कान में धीरे से फुसफुसा कर वे ही बातें तो की जाती है जिनके बारे में फुसफुसाने वाले को भय होता है कि कहीं ये बातें उस शख्स तक न पहुंच जायें जिसके बारे में वे कही गयी हैं। किसी की कमजोरियों को जगजाहिर करने में गर्व का अहसास होता है, दूसरों की छिछालेदारी में आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है लेकिन यह क्षणिक सुख, गर्व और आनंद चुगलखोर को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करते हैं कि वह सबके लिए अविश्वास का पात्र बन जाता है।

चुगलखोरी एक ऐसी लत है जो आसानी से पिंड नहीं छोड़ती। यह एक चस्का है जो धीरे-धीरे चस्केबाज को ही लील जाता है, अत: अच्छा हो इस इल्लत से शुरू से ही बचें। किसी की बात इधर से उधर पास करने से पहले जरा सोचें कि यदि कोई आपके बारे में ऐसा करे तो कैसा लगेगा।

किसी की कमजोर नस पर हाथ रखने से पूर्व अपनी कमजोरियों और उनके सार्वजनिक होने से पहुंचने वाली पीड़ा का अहसास कर लें तो शायद चुगलखोरी से दूसरों को पहुंची पीड़ा की अनुभूति हो सके।

आपकी एक चुगलखोरी किसी का घर तोड़ सकती है, किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को दाग लगा सकती है और किसी के लिए अपमान का सबब बन सकती है। यदि आप इन सब बातों पर गौर करेंगे तो स्वयं ही कह उठेंगे 'चुगलखोरी? न बाबा न !

- घनश्याम बादल

Share it
Top