पति की इच्छाओं को समझें

पति की इच्छाओं को समझें

रश्मि राकेश की पत्नी है। विवाह सूत्र में बंधे हुए दो वर्ष का समय बीत चुका है। रश्मि एक पब्लिक स्कूल में साइंस टीचर है। राकेश एक कंपनी में जूनियर मैनेजर के पद पर कार्यरत है। वह एक स्वस्थ, सुंदर और स्मार्ट युवक है। वह अपनी पत्नी से एक दो दिन का छोड़कर सहवास करने की इच्छा रखता है। इस उम्र में यह स्वाभाविक भी है लेकिन रश्मि का स्वभाव पति की इच्छाओं के बिलकुल विपरीत है। उसकी धारणा है कि रोज रोज के सहवास करने से फिगर बिगड़ जाती है।

वह जल्दी ही संतान भी पैदा करना नहीं चाहती। इसी कारण वह सहवास से कतराती है। कार्य की व्यस्तता, थकान या तबियत ठीक न होने का बहाना बनाकर वह पति की इच्छाओं को अधर में छोड़कर सो जाती हैं। पत्नी की इसी आनाकानी और बहानों के कारण राकेश शारीरिक तुष्टि न मिल पाने के कारण अतृप्त रहता है। उसे मानसिक तनाव बना रहता है।

कुछ दिन पहले ही राकेश का परिचय उसी के कार्यालय में आई नई लड़की रोजी से हुआ। रोजी एक चुलबुली, हंसमुख, चंचल और सुंदर आकर्षक नवयौवना थी। उसकी चंचल आंखों में प्यार का निमंत्रण था। उसमें सेक्स अपील और रिझाने की अदाएं थी। राकेश को रोजी का सामीप्य मिला और वह पत्नी की बेरूखी और उपेक्षा भरे माहौल को भूल गया। दोनों में मेल मिलाप बढ़ा, होटल-सिनेमा आना जाना हुआ और यौन संबंध स्थापित हो गए।

ऐसी ही कहानी पंकज और शारदा की है। पिछले ही वर्ष विवाह हुआ है। शारदा ऐसे परिवार से संबंध रखती है जहां नित्य पूजापाठ और व्रत आदि को विशेष स्थान प्राप्त है, अत: शारदा भी उन्हीं संस्कारों में पली-बढ़ी हुई लड़की है। वह भी सप्ताह में एक दो बार व्रत रखती है तथा नियमित रूप से सांझ सवेरे पूजा-पाठ करती है। पति के बार-बार के सहवास की इच्छा से कतराती है। इस अपवित्र कार्य के कारण उसे लोक-परलोक और देवी-देवताओं के कुपित होने का भय बना रहता है। पंकज बेचारा पत्नी की इच्छा के विरुद्ध कुछ कर नहीं सकता, इसलिए काम-पीड़ा को मन मसोस कर सहन करना पड़ता है।

एक दिन उसका भी संपर्क कार्यालय की युवा विधवा कर्मचारी आशा से हो गया। आशा एक काम पीडि़त युवा स्त्री थी। पंकज और आशा की नजदीकियां बढऩे लगी। बाहर घूमना फिरना हुआ। देखते-देखते जवानी के लहू में उबाल आया और वह सब कुछ हो गया जो एक स्त्री-पुरुष में होता है।

उपरोक्त दोनों केवल उदाहरण मात्र हैं। इनके द्वारा यह स्पष्ट करने की चेष्टा की गई है कि अशिक्षा, अज्ञानता, घमंड, खुदगर्जी, उपेक्षा और मिथ्याभिमान आदि ऐसी बातें हैं जो स्त्री पुरुष को यौन कृपण और सेक्स माइजर बनाते हैं।

विवाह का प्रथम आधार पति-पत्नी द्वारा एक दूसरे को शारीरिक सुख प्रदान करना है। यदि कोई पक्ष इस कार्य की पूर्ति में अक्षम रहता है तो वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ जाता है और रिश्ते टूटते देर नहीं लगती। शादी से पहले हर कोई अपने प्रियतम के बारे में हृदय में अनेक सपने संजोता है। यदि वे ही टूट जाएं तो जीवन जीना दूभर हो जाता है।

सहवास में स्त्री की विशेष भूमिका होती है। जहां स्त्री अपने रूप-यौवन, बनाव श्रृंगार, मदमस्त अदाओं और प्यार से संभोग को पूर्ण आनंददायक बना सकती है, वहीं उसका असहयोग, उपेक्षा और अनमनापन पुरुष के मन में वितृष्णा भर देता है।

संभोग का अर्थ सम - भोग अर्थात समान रूप से भोगना होता है, इसलिए यौन संबंधों को सफलतापूर्वक अंजाम देना दांपत्य जीवन की आधार शिला है। जहां पति को इस ओर अधिक सतर्क, प्रयत्नशील तथा सावधान रहना चाहिए, वहीं पत्नी का भी यह परम कर्तव्य हो जाता है कि वह पति की इच्छाओं को समझे और उनका सम्मान करें क्योंकि पत्नी के द्वारा सहवास में बार बार के असहयोग और उपेक्षित व्यवहार के कारण पति के मन मस्तिष्क में पत्नी के प्रति घृणा और निराशा का भाव उत्पन्न हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह वेश्यागामी या परस्त्रीगामी बन सकता है।

महर्षि वात्स्यायन ने जहां भोजन कराते समय पत्नी को मां के समान आचरण का आदेश दिया है वही उसे संभोग के समय वेश्या के समान रति प्रवीणता का उल्लेख किया है। पत्नी को चाहिए कि वह अपने कार्य कलापों और पूरे सहयोग से संभोग को तुष्टिदायक, आनंद दायक, आकर्षक, पूर्णता प्रदान करने वाला और प्रेम को बढ़ाने वाला बनाये।

संभोग स्त्री-पुरुष का साझा खेल है जिससे दोनों ही शारीरिक तुष्टि प्राप्त करते हैं। जैसे भूख को शांत करने के लिए पेट को भोजन की आवश्यकता होती है उसी प्रकार संभोग भी दोनों की शारीरिक और प्राकृतिक भूख है। इसकी पूर्ति होना भी अति आवश्यक है। इस ओर एक दूसरे के द्वारा इच्छाओं को उपेक्षित करना परस्पर घृणा, द्वेष और तिरस्कार का भाव भर देता है तथा गृहस्थी का अमन-चैन समाप्त हो जाता है।

सहवास की इच्छा केवल पुरुष में ही होती है, ऐसी बात नहीं है। प्राय: पुरुष स्वभाव थोड़ा उतावला और पहल करने वाला होता है, इस कारण यह धारणा बना ली जाती है। स्त्री स्वभाव से संकोची और शर्मीली होती है इसी कारण वह अपनी काम वासना को प्रदर्शित नहीं करती। कहने का तात्पर्य यह है कि काम क्र ीड़ा का यह खेल पति और पत्नी का साझा होता है और दोनों को ही इसकी सुखद अनुभूति होती है।

पत्नी को चाहिए कि वह पति की इच्छाओं को समझे और ऐसा व्यवहार न करे जो गृहस्थ जीवन में दरार पैदा करने वाला हो। जब पति मिलन शय्या पर कामक्रीड़ा में मस्त हो तो पत्नी को चाहिए वह कोई ऐसी बात न करे जो पति के मन में क्रोध और तनाव पैदा करें। इससे प्यार भरा वातावरण बिगड़ सकता है। पत्नी को यह भी जान लेना चाहिये कि पति की संभोग आदतें किस ढंग की हैं, उसके अनुरूप अपने आप को ढाल कर मिलन में चार चांद लगाने चाहिए। सच, पति को रिझा कर आप गृहस्थी का सच्चा सुख प्राप्त कर सकती हैं।

- परशुराम संबल

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