प्रशंसा करना भी एक कला है

प्रशंसा करना भी एक कला है

आज के इस व्यस्त जीवन में किसी के पास वक्त नहीं है कि वह अपना काम छोड़कर दूसरों की बातों पर ध्यान दे परंतु कभी कभी ऐसा समय आ ही जाता है जब चाहे अनचाहे आपको किसी विषय पर राय देनी हो। जैसे आपके परिचित या पड़ोसी बाजार से कोई नयी वस्तु ले आयें और उस पर आपकी प्रतिक्रि या जानना चाहें और आप अपने काम में मशगूल वस्तु को बस एक नजर देखकर 'अच्छी है' कहकर टाल जाते हैं पर जरा सोचिए कि सामने वाले व्यक्ति पर इस बात का क्या प्रभाव पड़ा। वह जितने चाव से अपनी वस्तु दिखाने लाया है, उस पर आपने उतनी ही कठोरता से 'अच्छी है' का मार्क लगाकर उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई। अच्छा तो यह होता कि आप दो मिनट रूककर उसकी बात सुनते, उस वस्तु के विषय में पूछकर उसका उत्साह बढ़ाते और अंत में उसकी अच्छाई या बुराई के बारे में अपना पक्ष रखते। इसमें कोई अधिक समय नहीं लगता पर सामने वाले के मन में संतुष्टि के भाव अवश्य आ जाते हैं। कुछ लोग इसी बात को ध्यान में रखकर कुछ ज्यादा ही बातें बोल देते हैं, जिससे सामने वाले व्यक्ति को लगता है कि कोई उसकी तारीफ करने के बजाय मजाक उड़ा रहा है। वास्तविकता से दूर जब बहुत अधिक प्रशंसा होने लगे तो इसी बात का अहसास होता है। कई लोग तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें केवल अपनी पसंद, अपने विचार, अपनी बातें ही अच्छी लगती हैं। वे कभी भी किसी दूसरे की प्रशंसा करना नहीं जानते। ऐसे लोगों से प्रशंसा के दो बोल की उम्मीद करना सरासर मूर्खता है। ऐसे लोग बिना किसी की भावनाओं का ख्याल किये अपनी बात कह देते हैं। वास्तव में प्रशंसा करना एक कला है जिसके माध्यम से हम किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर एक आत्मविश्वास के साथ अपनी छाप भी छोड़ते हैं। अति से बचते हुए समान भाव से की गई तारीफ, तारीफ पाने वाले में ही नहीं बल्कि प्रशंसक में भी एक नई आशा और खुशी की किरण पैदा कर देती है, इसलिए प्रशंसा करते समय सरल और मृदु वाणी का उपयोग करें। साथ ही परिस्थिति व थोड़ी सामने वाले की रूचि का ध्यान भी रखें।

एक अच्छे प्रशंसक बनकर आप में आकलन करने की क्षमता तो विकसित होगी ही, आप सामने वाले व्यक्ति की नजर में एक अच्छे इंसान भी साबित होंगे।

-ममता पटेल

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