घर की मुर्गी नहीं है गृहिणी

घर की मुर्गी नहीं है गृहिणी

कहावत है कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर'। बात गृहिणी की है। बेचारी सबसे पहले उठती है और सब को सुलाने के बाद ही उसे जरा सा कमर सीधी करने का अवसर मिल पाता है। दिन भर चरखी की भांति घूमती है। परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य की हर मांग पूरी करती है। हर एक की आवश्यकता, फरमाइश और पसंद का पूरा-पूरा ध्यान रखती है। यही नहीं, हर सामाजिक, धार्मिक दायित्व भी पूरी लगन और उत्साह से निभाती है।

जिस गृहिणी पर पूरे परिवार का सुचारू संचालन निर्भर है, उसे उचित महत्त्व देना तो दूर, उस की ओर कभी किसी का ध्यान ही नहीं जाता। उसे तो जैसे घर के बर्तन, फर्नीचर या अन्य सामान का अंग मात्र मान लिया गया है जिस पर कोई ध्यान देना अनावश्यक और फिजूल हो।

एक गृहिणी दिन भर में क्या-क्या और कितना काम करती है, क्या कभी आप ने इस पर गौर किया है। यदि वे सारे काम मेहनताना दे कर कराए जाएं तो कितना खर्च होगा, क्या कभी इस का अनुमान लगाने की चेष्टा की है। छोटे-छोटे और मामूली घरेलू कामों जैसे चौका बर्तन, झाडू पोंछा, कपड़े धोना आदि के लिए भी नौकर मिलना कितना कठिन हो गया है। उन की मांग भी कितनी बढ़ गई है। उन के देर से आने, नागा कर जाने, कभी-कभी चोरी चकारी की आदत होने से कितना मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। पूरे समय का नौकर रख पाना तो सामान्य मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए अब संभव ही नहीं रहा। वैसे भी घरेलू कामों के लिए आजकल नौकर मिलते ही कहां हैं।

जरा एक कागज और कलम लीजिए और मोटा-मोटा अनुमान लगा डालिए कि प्रात: उठने से लेकर देर रात गए सोने तक गृहिणी ने आज जो-जो काम किए हैं, बाजार भाव से अनुमानत: उनका मेहनताना क्या होगा। जो आंकड़े सामने आएंगे, वह निश्चय ही आंखें खोल देने वाले होंगे। स्मरण रहे कि इस लेखे-जोखे में उस हार्दिक स्नेह, ममत्व, अपनत्व और प्यार का मूल्य सम्मिलित नहीं है जो गृहिणी के हर कार्यकलाप में स्वाभाविक रूप से जुड़ा होता है। वह तो अनमोल है ही।

पुरूष की कमाई नजर आती है। पुरूष को उस का गुमान भी होता है। उसी के बल पर परिवार में उस का वर्चस्व भी रहता है। गृहिणी की अपेक्षाकृत कहीं अधिक मेहनत का न तो कोई मूल्यांकन ही होता है और न ही वह नकदी के रूप में सामने नजर ही आती है। इसीलिए औरों को तो क्या, स्वयं गृहिणी को भी अपनी कीमत का, परिवार की समृद्धि में अपने योगदान का कोई अहसास तक भी नहीं होता।

मजे की बात तो यह है कि जो गृहिणियां घर का पूरा काम संभालने के साथ-साथ नौकरी भी करती हैं और इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से भी परिवार की आय में अच्छी खासी वृद्धि करती हैं, उनका भी कोई महत्त्व तो क्या, अस्तित्व तक भी स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसा क्यों? कब तक चलेगी यह स्थिति।

महिला वर्ष मनाने और नारी उत्थान की बड़ी-बड़ी बातें भर कर लेने से वर्तमान व्यवस्था में न तो कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है और न ही तब तक कुछ होना है जब तक साधारण घरेलू महिलाएं अपना दब्बूपन छोड़ कर स्वयं अपना मूल्य नहीं पहचानेंगी और अपनी आवाज बुलंद नहीं करेंगी।

साधारण स्त्री का मुद्दा साधारण स्त्री को ही उठाना होगा-आपको, आप सब को, आज ही, अभी। पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

- ओम प्रकाश बजाज

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