किशोरावस्था में अभिभावकों का उत्तरदायित्व

किशोरावस्था में अभिभावकों का उत्तरदायित्व

मीनू हमेशा अपनी मम्मी से झगड़ती रहती है। सोलह वर्षीय मीनू को मम्मी की कोई नसीहत अच्छी नहीं लगती और जबसे मम्मी ने पड़ोस में रहने वाले मन्टू को लेकर उसे डांटना शुरू किया है, तब से तो उनसे उसकी नाराजगी ज्यादा ही बढ़ गयी है। मम्मी का कहना है कि पड़ोस में रहने वाले मन्टू से मिलना-जुलना बंद करे जबकि मीनू मन्टू से अपनी दोस्ती बरकरार चाहती है।

वैसे बात इतनी सी ही होती तो मम्मी की बात आज के जमाने में निश्चित रूप से दकियानूसी लगती। दरअसल मामला दो पायदान आगे चला गया था, जिसकी भनक मम्मी को लग रही थी। जब कभी उससे जबाबदेही हुई, वह बात को टाल गई।

अब अगर उम्र के इस मोड़ पर मीनू कुछ ऐसा कर बैठे जो वाकई इस उम्र में नहीं करना चाहिए तो इसमें दोष किसका माना जाएगा? घर ही वह पहला पायदान है जहां बच्चे को सहजता से अपनी किसी भी समस्या का समाधान प्राप्त होता है।

माता-पिता और अभिभावक की भूमिका अगर दोस्त की कम और अनुशासन की ज्यादा होगी तो बच्चे धीरे-धीरे उनसे दूरियां रखने लगते हैं। जिस दुनियां में वे इस उम्र में प्रवेश कर रहे होते हैं, ढेरों नई जानकारियां, नए अनुभव और नई भावनायें उनमें जागृत होती हैं। ऐसे वक्त उनको एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है जो उनकी समस्या का समाधान एक दोस्त के रूप में कर सके।

इसके विपरीत जब अभिभावक तानाशाह अनुशासक बनकर उसकी इन प्रवृत्तियों को दबाने की कोशिश करते हैं तो उन किशोरों में दुराग्रह, चोरी व अन्य बुराइयों का समावेश होता है। नतीजन उनके बीच दूरियां बढऩे लगती हैं।

दरअसल अभिभावक अपनी किशोरावस्था में पले-परिवेश से ग्रसित होते हैं। उनको वही पुरानी धारणा पसंद होती है जिसमें बच्चे को डांट-फटकार व दण्डित किया जाता है। उनको शायद इसका आभास नहीं होता कि इसी-धारणा के कारण वे अपने माता-पिता दूर होते गए थे।

वर्तमान समय में दिन प्रतिदिन आ रहे सामाजिक परिवर्तन के लिए हमारे अत्याधुनिक संसाधन जिम्मेदार हैं जिनसे दुनियांभर की कला-संस्कृतियां, रेडियो, टीवी इत्यादि के माध्यम से हमारे बच्चे रूबरू हो रहे होते हैं। उस स्थिति में अपने अभिभावकों द्वारा पुराना व पिछड़ा दृष्टिकोण उनमें उनके प्रति उत्प्रेरक का काम करता है।

वर्तमान समय में इस बात की जरूरत है कि अभिभावक विपरीत सेक्स से दोस्ती को सहज रूप से लें और प्यार, मुहब्बत के मामले में नैतिकता व प्रतिष्ठा का दृष्टिकोण न रखें बल्कि उनको दोस्त बनकर हकीकत को समझाने की कोशिश करें कि इस समय उसका अपने कैरियर बनाने का समय है। अभी ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए। वास्तव में यह उम्र बच्चे और अभिभावक के बीच एक अपनत्व भरे रिश्ते को नींव देने की आवश्यकता होती है।

-आर. पी. यादव

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