लड़कियां आजादी को दे रही हैं गलत मोड़

लड़कियां आजादी को दे रही हैं गलत मोड़

कितना गलत इंटरप्रेटेशन है आजादी का आज की लड़कियों के लिए। बड़ों की बात तो उन्होंने सुननी नहीं, फिर उन्हें सही राह दिखाए भी तो कौन और कैसे? एक तरफ उन पर बढ़ते जुल्म, अत्याचार, रेप, मर्डर जैसे कुकृत्य, दूसरी तरफ उनका जरूरत से ज्यादा एक्सपोजर, मर्द को लुभाने के लिए बढ़ते हथकंडे। दोष किसे दें?

अमीर घरों की बात लें तो यहां जीवन फिल्मी स्टाइल में जिया जाने लगा है। आधुनिकता का नशा केवल युवक युवतियों पर ही नहीं बल्कि उनके अधेड़ मां-बाप पर भी पूरी तरह छाया है। उन्हें अपने मौज मजे से ही फुर्सत नहीं। संतान को देने के लिए उनके पास समय ही नहीं। वे क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, उनका उठना बैठना कैसे लोगों के साथ हैं, इसकी उन्हें इतनी परवाह नहीं जितनी अपने नाम यश व धन की है, समाज में अपनी इमेज की है।

जिस सभ्यता में ये लड़कियां पल रही हैं, वहां हाथ से काम करना शान के खिलाफ समझा जाता है। उन्हें शुरू से हर छोटे बड़े काम के लिए नौकरों पर निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है। घर में कम सदस्य होने के कारण संवादहीनता की स्थिति बनी रहती है।

ऐसे में लड़कियां भावनात्मक सहारा ढूंढती हैं। उन्हें अच्छे बुरे व ऊंच नीच की पहचान तक नहीं होती, इसीलिए कई बार वे घर के जवान नौकर, ड्राइवर, मेकेनिक गरज यह कि बाप भाई को छोड़कर जो भी पहला मर्द आसपास रहता है, उसी के साथ इश्क फरमाने लगती हैं। कभी नशे की लत, कभी मॉडलिंग के आकर्षण में बंधी गलत लोगों के चंगुल में फंस जाती हैं।

ऐशो आराम की जिंदगी उन्हें आत्मकेंद्रित और स्वार्थी बना देती है। संवेदनहीन होकर वे केवल आधी अधूरी जिंदगी समझ पाती हैं और जीती हैं।

समय रहते अगर मां बाप लड़की की परवरिश पर ध्यान न दे पाए तो लड़कियां गलत राह पकड़ लेती हैं। भारतीय संस्कृति आचार विचार संस्कार का ए.बी.सी. भी मां-बाप उन्हें नहीं सिखाते। ब्याहने का वक्त आया तो चेतना जागी लेकिन अब तक काफी देर हो चुकी होती है।

लड़की उनके कंट्रोल से बाहर अपने जीवन की खुदमुख्तार बन चुकी होती है। पलटकर वे टीवी सीरियल और फिल्मी अंदाज में मां बाप को जवाब देती है और अपनी हर गलती के लिए उल्टा उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर देती है। उसकी नई दुनियां में अब उनके लिए यही बचा है।

उन्हें न पैसे की कद्र मालूम होती है न किसी चीज की क्योंकि अब तक उन्होंने पैसा भरपूर देखा है। वो कैसे कितनी मेहनत से आता है, इसका उन्हें अहसास तक नहीं होता। भूख प्यास क्या होती है, छोटी-छोटी चीजों के लिए मन को मारना कैसा होता है, उन्होंने कभी जाना ही नहीं। आजादी के माने क्या हैं, ये उन्हें माता पिता से बेहतर कौन समझा सकता है।

आज़ादी उच्छृंखलता नहीं है और न ही बिंदास लिविंग। आज़ादी होनी चाहिए अंधविश्वास, बुराई व गलत बातों की जकडऩ से। बच्चियों के साथ अभिभावक स्वयं समय नहीं गुजारेंगे तो दूसरों की दी हुई शिक्षा बेअसर रहेगी। उनकी पहली जरूरत है मां बाप का निश्छल स्नेह भरा अपनत्व व साथ। इसी में चारित्रिक और नैतिक उत्थान का पौधा रोपा जा सकता है।

यह ठीक है कि ज्यादा रोक-टोक ठीक नहीं लेकिन लड़कियों को आज़ादी भी सीमा में ही दी जानी चाहिए। उनकी हर जायज नाजायज मांग के आगे झुकना प्यार नहीं। उन पर विश्वास करें मगर अंधविश्वास नहीं।

जब लड़की जवान होने लगती है तो माता-पिता को उन्हें लेकर चौकन्ना तो रहना ही पड़ता है। वह कहावत 'प्रिवेन्शन इज़ बैटर दैन क्योर' इस मामले में पूरी तरह लागू है।

खाली दिमाग शैतान का घर होता है इसलिए यह देखें कि वे खाली न रहें। उन्हें कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। जॉब करती हैं तो भी अच्छा है। समय रहते शादी कर के घर बसाएं। एक सुरक्षित सुखी जीवन का यह सबसे अच्छा फॉर्मूला है।

-उषा जैन 'शीरीं'

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