सुख का आधार है संयुक्त परिवार

सुख का आधार है संयुक्त परिवार

आज विवाह-विच्छेद और पारिवारिक टूटन की बातें आम हो गयी हैं। अब वृद्धों का परिवार में रहना क्र मश: कठिन और कष्टप्रद होता जा रहा है। पश्चिमी देशों में तो काफी पूर्व से वृद्धों के लिए पार्क, क्लब और पृथक आवास की योजनाएं चल रही हैं किंतु भारतवर्ष में भी 'वृद्धाश्रम' जैसा शब्द अनजाना नहीं रहा। हमारे माता-पिता हमारे लिए ही बोझ बनते जा रहे हैं।

बिखरते परिवार: औपचारिक होते संबंध:- सौ-पचास साल पहले परिवार संबंधी संकल्पना में पति-पत्नी, माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, परदादा-परदादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, बहन-बहनोई, साला-सलहज, आदि सभी रिश्तों का समावेश होता था लेकिन अब परिवार का अर्थ होता है-'पति, पत्नी और बच्चे'।

नौकरी या व्यापार के कारण अधिकांश लोग अपने जन्म स्थान से दूर चले जाते हैं। भागदौड़ की जिंदगी और पैसा कमाने की बेताबी ने लोगों को परिवार से अलग रहने पर मजबूर कर दिया है।

छोटा परिवार: सुखी परिवार किस मायने में ?:- छोटे परिवार को सुख का आधार माना जाता है क्योंकि उसके भरण पोषण में व्यय कम होता है, साथ ही बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सकती है तथा स्वास्थ्य रक्षा की जा सकती है किंतु दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ आदि के संरक्षण और प्यार में मिलने वाले पोषण शिक्षण और संस्कारों की आवश्यकता पर हम ध्यान नहीं दे रहे।

नतीजा हमारे सामने है। आज की पीढ़ी बुजुर्गों का सम्मान नहीं करती और न ही उसमें परिवार तथा समाज के प्रति कोई निष्ठा ही है। सिर्फ आर्थिक सुख-सुविधा से जीवन को सुख-शांतिमय नहीं बनाया जा सकता। सीमित संक्षिप्त परिवार के चलते आज बच्चों में स्वार्थपरता, अहंकार, मूढ़ता और घृणा की भावना तीव्र गति से बढ़ रही है।

सुख का सही आधारद्ब्रसंयुक्त परिवार:- संयुक्त परिवार में सबकी शक्ति, बुद्धि और दक्षता का सदुपयोग होता है। उत्तरदायित्व का कोई लिखित आदेश नहीं होता। उसे नहीं निभाने पर दण्डविधान भी नहीं है किंतु सभी लोग अनायास ही अपने कर्तव्य कर्म करते चलते हैं। सास की जिम्मेदारी बहू, पिता की पुत्र उठा लेते हैं। नन्हे मुन्ने दादा दादी, नाना-नानी का प्यार पाते और पुष्ट होते हैं। अपने बच्चों को बुजुर्गों के आश्रय में छोड़कर माता-पिता निश्चिंत होकर धनार्जन कर सकते हैं।

बच्चों की किलकारी, किशोरों के अल्हड़पन और युवाओं के संकल्प के स्वर तथा वृद्धों के परिपक्व विचारों से सारा आंगन गुंजायमान होता है। ऐसे सुख-संतोष भरे वातावरण को ही स्वर्ग की उपमा दी गयी है। न कहीं घुटन होती है न ही अधिकारों के लिए मारामारी। इस तरह संयुक्त परिवार प्रत्येक दृष्टि से सुखकर है।

अगर हम अपने परिवार को बचाना चाहते हैं तो संयुक्त परिवार के महत्त्व को समझें और पाश्चात्य हवा में न बहें। भारत को फिर से चतुर्मुखी विकास करना है तो परिवार संस्था को मजबूत बनाना होगा।

- पं. घनश्याम प्रसाद साहू

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