घर परिवार: बच्चों से पक्षपातपूर्ण व्यवहार उन्हें कुंठाग्रस्त करता है

घर परिवार: बच्चों से पक्षपातपूर्ण व्यवहार उन्हें कुंठाग्रस्त करता है

नेहाजी की बहू बड़े विचित्र स्वभाव की आई थी। क्या करें उसके साथ नेहाजी। उसे लेकर वे बेहद तनावग्रस्त रहतीं। मजे की बात यह थी कि चूंकि उन्होंने मनोविज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की हुई थी, सो वे मानवीय फितरत बखूबी समझने का दावा करती थी। अपनी सहेलियों व परिचितों को सही सलाह देकर उन्हें अपना एहसानमंद बनाती रहतीं। बस अपने घर की समस्या ही नहीं सुलझा पा रही थीं।

नेहाजी ने अपनी बहू नीलिमा की गुत्थी सुलझाने की ठान ली। वे रिश्तों की अहमियत में विश्वास जो रखती थीं।

फिर जल्दी ही उन्हें नीलिमा के विद्रोही तेवर का राज समझ में आने लगा। दबे हुए रंग की नीलिमा हालांकि प्रतिभाशाली थी लेकिन अपने मां बाप की तीसरी लड़की थी। वह उन पर भार थी। लड़के की आस में लड़कियों की लाइन लगाने वाले मां बाप उसके आगमन पर दुखी थे। पहली बेटियां गोरी चिट्टी थीं। उन्हें तो वे फिर भी सहन कर लेते लेकिन नीलिमा के साथ वे हमेशा पक्षतापूर्ण व्यवहार करते। हर बात के लिये उसे दोषी ठहराते। बाप की तो जैसे उसकी शक्ल देखते ही आंखों में खून उतर आता। डरी सहमी नीलिमा कुंठाग्रस्त रहने लगी।

नीलिमा के बाद जब उसके भाई गौरव का आगमन हुआ तो मानो सारा घर उसके पीछे पागल हो गया। नीलिमा भी औरों की तरह उसे गोद में लेकर खिलाना चाहती, उसे छूना चाहती, प्यार करना चाहती पर ऐसा करने पर वो एकदम से झिड़क दी जाती। बच्ची होने पर भी वो अपमान की त्रसदी महसूस कर सकती थी।

हमेशा असुरक्षित, प्यार की भूखी एकाकी नीलिमा, ससुराल में भी सब को अविश्वास से देखती। इस उम्र तक आते-आते लड़कियां इतनी परिपक्व हो जाती हैं कि उन्हें बदल पाना असंभव नहीं तो आसान भी नहीं होता। उनके स्वभाव का कहर बरसता है, उन पर जो अब उसके नज़दीकी बन जाते हैं, जिनकी उससे कुछ आशाएं जायज़ होती हैं।

मां बाप के बच्चों से गलत रवैय्ये के दूरगामी परिणाम होते हैं। बच्चे की जिंदगी में जो ज़हर घुलता है इस कारण, बच्चे उन्हें कभी माफ नहीं करते। प्यार और बुढ़ापे में सेवा तो दूर की बात है।

जिसके कारण उन्होंने अपने दूसरे बच्चे को उपेक्षित प्रताडि़त किया था, वो अक्सर अतिरिक्त प्यार के कारण बिगड़ जाता है। तब मां बाप के पास पश्चाताप ही रह जाता है।

मां बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों से समान रूप से व्यवहार करें। कायदा सब के लिये एक सा हो। एक के लिये कुछ, दूसरे के लिए कुछ ये ठीक नहीं है। बच्चों में आपस में प्यार बढ़े, यह देखना आपका भी कर्तव्य है।

ऐसा तो नहीं है कि सब कुछ मन चाहा ही होगा। बच्चों का अपना व्यक्तित्व बनने लगता है। कई बार लाख चाहने पर भी सब कुछ बेकाबू होकर रह जाता है। इसे भाग्य या परिस्थितियों का खेल, फितरत या ऐसा ही कुछ कहा जा सकता है लेकिन तब कम से कम आप इस अपराधबोध से ग्रस्त तो न रहेंगे कि इसके कारण आप हैं।

क्या कर सकते हैं आप ?

दूसरे बच्चे के आने से पूर्व ही पहले को उसके आगमन के लिए मानसिक रूप से तैयार कर दें। बच्चे की देखभाल और कार्यकलापों में उसका, उसकी उम्र को देखे हुए इन्वाल्वमेंट रखें जैसे बच्चे को किस नाम से पुकारा जाए। उसके लिये सामान खरीदते हुए बड़े बच्चे की चॉइस भी पूछी जाए।

उससे इस तरह की बातें की जाएं कि उसे जिम्मेदारी का अहसास हो लेकिन साथ ही उससे उसका बचपन न छिन जाए, यह देखना भी बहुत जरूरी है क्योंकि अक्सर यह गलती मां बाप करते हैं। यह बच्चे के साथ नाइंसाफी होगी। बच्चे को बच्चा ही रहने दें और उस प्यार और ममता में कोताही न करें जिस पर उसका हक है।

माना अब आप की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, आपके पास वक्त की कमी रहने लगी है लेकिन आपके प्यार में कमी नहीं आनी चाहिए। प्यार न केवल प्रेरणा है बल्कि ऊर्जा का स्रोत भी है। जब बच्चे को आपकी जरूरत हो, आपसे वो कुछ बात करना चाहता हो, आप उसकी सुनें जरूर। इतना धैर्य आप में होना चाहिए।

- उषा जैन 'शीरीं'

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