प्रशंसा करें लेकिन सोच-समझकर

प्रशंसा करें लेकिन सोच-समझकर

अक्सर जब तुम प्रशंसा करते हो तो किसी और की तुलना में करते हो। किसी एक की प्रशंसा करने में हम किसी दूसरे को नीचा दिखाते हैं और किसी की गलती को दर्शाने के लिए हम दूसरे की प्रशंसा करते हैं। कुछ लोग प्रशंसा करने में कंजूस होते हैं और कुछ शर्मीले। कुछ लोगों को प्रशंसा करनी नहीं आती और प्रशंसा करना भूल जाते हैं। कुछ व्यक्ति मतलब के लिए प्रशंसा करते हैं और कुछ तुम्हें उठाने के लिए। कुछ और लोग अपने आत्मविश्वास की कमी को छुपाने के लिए स्वयं की प्रशंसा करते हैं। किन्तु वास्तविक प्रशंसा उन्नत चेतना की अवस्था से निकलती है। जो प्रशंसा उन्नत चेतना की अवस्था से आती है, वह स्वरूप से आती है और बिल्कुल भिन्न होती है। साधारणत प्रशंसा लालसा और दम्भ से आती है। उन्नत चेतना की अवस्था से आई प्रशंसा पूर्णता से उभरती है। निसंदेह प्रशंसा चेतना को उभारती है और उत्साह व ऊर्जा लाती है। परंतु साथ ही यह घमंड भी ला सकती है। प्रशंसा करना भी एक कौशल है। जब कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, तो क्या तुम बिना शर्माए उसे स्वीकार करते हो: बिना शर्माए प्रशंसा को स्वीकार करना भी एक कुशलता है। तुम किसी की प्रशंसा कब करते हो: जब वे कुछ अनोखा करते हैं, असाधारण, जो उनके स्वभाव के अनुसार नहीं है। जब एक दुष्ट व्यक्ति कोई समस्या पैदा नहीं करता, तब तुम उसकी तारीफ करते हो। या कोई व्यक्ति जिसे भला नहीं समझते, जब कुछ नेक काम करता है, तब तुम उसकी प्रशंसा करते हो। जब कोई भला आदमी अत्यन्त असाधारण काम करता है, तब तुम उसकी प्रशंसा करते हो। यदि कोई बच्चा एक प्याली चाय बनाता है तो तुम प्रशंसा करते हो, परंतु वही एक प्याली चाय यदि मां बनाए तो तुम शायद तारीफ न करो, क्योंकि उसके लिए यह नियमित कार्य है। इन सभी स्थितियों में जिन कार्य की तुम प्रशंसा करते हो, वे अल्पकालिक हैं, उनके आचरण से अलग या उनके स्वभाव के विपरीत। तो जब तुम किसी चीज के लिए किसी की प्रशंसा करते हो, तुम संकेत करते हो कि वे लोग साधारणत ऐसे नहीं हैं। इसका मतलब है कि वह कार्य उनके स्वभाव में नहीं और इसीलिए वे अपनी प्रशंसा चाहते हैं- यह एक विरला गुण या कृत्य है। प्रशंसा एक अलगाव के भाव, एक दूरी को इंगित करती है, इसीलिए प्रशंसा करते समय सावधान रहो।

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