संस्कृति का संरक्षण कर सकती है नारी

संस्कृति का संरक्षण कर सकती है नारी

वर्तमान में जबकि विश्व के सभी देशों में विश्व संस्कृति अपनाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे समय में अपनी मूल संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखना आज की स्थिति में और भी आवश्यक है। किसी भी राष्ट्र की मौलिक पहचान और गरिमा उस राष्ट्र की संस्कृति से जानी जाती है। इस तथ्य में कोई संदेह नहीं कि नारी अपनी संस्कृति का संरक्षण पुरूष के मुकाबले बेहतर तरीके से कर सकती है। पश्चिमी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति को चोट पहुंचायी है। आजादी से पूर्व विदेशी वस्तुओं की होली जलाई जाती थी। आज विदेशी वस्तुओं के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया जा रहा है। जो व्यक्ति स्वदेशी का नारा लगाते थे, उन्हीं में से अनेक के बच्चे विदेशों में शिक्षा प्राप्त कर अपनी सेवा दे रहे हैं। ऐसे लोगों को अपना देश उचित नहीं लगता और ये ग्रीन कार्ड प्राप्त करने का भरसक प्रयास करते हैं। हमारे भीतर की मानवीय संवेदनाएं भी खत्म होती जा रही हैं। आंगन की रंगोली, तुलसी-चौरा पर दीप जलाना, गाय, कौओं तथा कन्या के भोजन का हिस्सा निकालना, हमारे तीज-त्यौहारों का प्रेम, सावन के झूले से लेकर बसंत की बहारें अब धीरे-धीरे समाप्त होने लगी है। हम अविराम भौतिकता की ओर भागते जा रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने वाली भारतीय नारी भी इस आधुनिकता के आगे आज नत नजर आती है जिसके कारण न केवल परिवार, बल्कि समाज और भावी पीढ़ी भी पश्चिमी संस्कृति में रची-बसी दिखाई देती है। जब तक हम इस सांस्कृतिक प्रदूषण को नहीं समझेंगे, तब तक इससे छुटकारा पाना मुश्किल है। दरअसल यह सवाल पूरी तरह भारत से नहीं बल्कि तीसरी दुनियां से संबंध रखता है। पाकिस्तान, कोरिया, सिंगापुर तथा अनेक अफ्रोएशिया के देश और उनके शहर, हमारे देश से कहीं ज्यादा आधुनिकता एवं पश्चिमीकरण से प्रभावित हैं। जब तक सभी देश अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रयत्नशील नहीं होंगे, तब तक निरंतर बढ़ रही पश्चिमीकरण से छुटकारा पाना नामुमकिन है। इसके लिए आवश्यक है इन सभी देशों को अपनी सांस्कृतिक सोच तथा मातृभाषा को प्रोत्साहन देना। विशेष रूप से महिलाओं को इस महत्त्वपूर्ण दिशा में सर्वाधिक योगदान देना होगा क्योंकि महिलाएं संस्कृति की सुरक्षा बेहतर तरीके से कर सकती हैं।

- उमेश कुमार साहू

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