बिंदास होते टीनएजर

बिंदास होते टीनएजर

आज की ज्वलंत समस्या है हमारे टीनएजर्स का इंटरनेट और मोबाइल एडिक्ट होना। यहां जानकारियां तो बहुत मिल जाती हैं लेकिन वो ज्ञान नहीं जो उन्हें एक अच्छा मानव बनाएं। जब वे अपने बुजुर्गों के संपर्क में ही नहीं आते तो कहां से अपनी संस्कृति अपनी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ जान पायेंगे। सोशल नेटवर्किंग का आकर्षण उन्हें इस कदर लुभा रहा है कि कई बच्चे रोजाना कई-कई घंटे इस पर बर्बाद करने लगे हैं। यथार्थ से दूर एक वर्चुअल दुनियां में विचरण करते वे जीवन से दूर हो रहे हैं। एस.एम.एस. या नेट पर फ्रैंडस को मैसेज करते वे शॉर्ट की वडर्स का प्रयोग करते हैं। इससे उनके भाषा ज्ञान पर बुरा असर पड़ता है। यह उम्र शब्द ज्ञान बढ़ाने की है मगर इस तरह के मैसेज के कारण उनके शब्दों का संग्रह सीमित हो चला है। साहित्यिक भाषा इस शॉर्टकट के कारण उन्हें अब अरूचिकर लगती है। इस बदलाव की हवा में सभ्यता की अनमोल देन भाषा की बलि चढ़ रही है। एक टीनएजर का शब्द ज्ञान आज बहुत सीमित रह गया है। पूरे दिन में वो बमुश्किल 400 शब्दों तक ही सीमित है ब्रिटेन में जहां इस विषय को लेकर अब काफी जागरूकता आ रही है वहां के टीनएजर बातचीत के लिए कम से कम इससे दुगने शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। वैसे देखा जाए तो रोज़ाना अभिव्यक्ति के लिए कम से कम एक हजार शब्दों का ज्ञान तो जरूरी ही है। जितनी वर्ड पावर होगी उतनी ही आसानी से आप अपनी बात औरों तक पहुंचाने में समर्थ होंगे। हमेशा पढ़ाई में टॉपर रहने वाली मनिका अभिव्यक्ति में कमजोर होने के कारण ही इंटरव्यू में फेल हो गई। कैरियर में सफल होने के लिये भी वर्डपावर से समृद्ध रहना आवश्यक है। मीडिया ने इन्हें एक शब्द दिया है 'जेनरेशन-एम'। (मोबाइल, मल्टीमीडिया, मल्टीटास्किंग, मल्टीचैनल, मैनरिज्म, माउस आदि की दीवानी) इलेक्ट्रॉनिक आयटम्स पर इनकी निर्भरता जो प्रॉब्लम्स क्रि एट कर रही है। उससे इन टीनएजर्स के पेरेंट्स का चिंताग्रस्त होना स्वाभाविक है। टीन एजर्स उस दौर से गुजर रहे होते हैं जब वे घर परिवार वालों, दोस्तों, जान पहचान वालों से इंटरएक्ट करके रिश्तों के मायने समझते हैं लेकिन गेजेट्स के साथ व्यस्त रहने पर उन्हें इन सब बातों के लिये समय नहीं मिलता। नतीजा होता है उनमें संवेदनशीलता कहीं दब कर रह जाती है। बाद में बड़े होने पर उन्हें 'आइडेंटिटी क्राइसिस' से गुजरना पड़ता है। शायद बढ़ते तलाक की संख्या का भी ये एक बड़ा कारण है। आज ये गेजेट्स जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। अपने बच्चों को इनसे दूर नहीं रखा जा सकता लेकिन जरूरी यह है कि पढ़ाई और इनके उपयोग में उचित बैलेंस रखकर चला जाए।

- उषा जैन 'शीरीं'

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