दांपत्य से क्रोध को दूर ही रखें

दांपत्य से क्रोध को दूर ही रखें

गुस्सा या क्रोध मानव मन की स्वाभाविक भावना है। जिस तरह मनुष्य मन की गहराई में प्रेम, घृणा, राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, सुख-दुख आदि मनोवृत्तियां विराजमान रहती हैं, ठीक उसी तरह क्रोध का अस्तित्व है।

एक सीमा तक किया गया क्रोध उचित भी है और आवश्यक भी किन्तु बेकाबू और असीमित क्रोध अनुचित व अनावश्यक है। आक्रोश उचित अनुचित के तराजू में खरा उतरना चाहिए, तभी उसकी सार्थकता है, अन्यथा परिणाम दुखद ही होंगे। जब पति पत्नी तनावग्रस्त हों, उन्हें घुटन, कुढऩ एवं कुंठा सालती रहती हो, तब इसकी सार्थकता को परखें, अनिवार्यता को जाने समझें अन्यथा फल दुखदायी होगा।

यहां सवाल यह भी कि किन दंपतियों मेें अनबन या लड़ाई झगड़े नहीं होते। अगर वे इस से मुक्त हैं तो या तो वे पूर्णत: सुखी होंगे या फिर सपाट व नीरस जीवन के आदी। विद्वानों के मत में जिन दपंतियों के मध्य तकरारें नहीं होती, उनका जीवन सूखे पेड़ की मानिंद है वहां न शीतल छाया होती है और न ही सुगंधित पवन। होती है तो महज वीरानी।

सवाल यह है कि हम क्रोध को पूरे आवेश के वशीभूत व्यक्त करें अथवा उसे काबू में रख कर रचनात्मक कार्य करें। न अकारण और असमय क्रोध करें और न ही प्रतिक्रि या विहीन रहें अपितु संयत विरोध करते हुए मन में गुस्से को न पनपने दें। यद्यपि मध्यम मार्ग से ऐसा लगेगा कि आत्मसम्मान को ठेस लग रही है, परन्तु यह तथ्य आपके सुखी दांपत्य में मील का पत्थर साबित होगा।

अगर हम क्रोध की खौलते पानी की भाप से तुलना करें जिससे कल कारखाने, इंजन एवं स्टीमर चलते हैं, तो इस तथ्य को भली भांति समझा जा सकता है कि नियंत्रित क्रोध मानव के नवनिर्माण में किस तरह सहायक है। क्रोध के नियंत्रित प्रयोग से जीवन निर्माण में अनूठी गति आती जाती है। इस के समुचित प्रयोग से पति पत्नी धीर गंभीर रहते हुए कठिन परिस्थिति में भी मनोमालिन्य नहीं रखते। वे आत्म संयम का मार्ग अपनाते हुए जीवन को सुखमय सौहार्दमय बनाने में कोई कसर नहीं रखते। यहां कुछ युक्तियां दी जा रही हैं। इसके सफल प्रयोग से आप गृहस्थ को सुखी व सम्पन्न बना सकेंगे।

अप्रिय स्थिति से बचें-

जब जब आपस में तकरारें हों, आपत्तिजनक बात छिड़े, तब तब अप्रिय स्थिति से बचें। उत्तेजक बात या प्रसंग छिडऩे पर संयम से काम लें। संयमित बातों से ही अपनी उग्र भावनाओं का आदान प्रदान करें।

ऊपर जो पड़ोसी के दृष्टांत दिए गए हैं, उसमें यदि दंपति शारीरिक हिंसा के बजाए जुबान से काम लेते तो यह अशोभनीय स्थिति निर्मित नहीं होती। कुछ देर पश्चात दोनों अपनी अपनी गलती का एहसास करते हुए शांत संयत रह जाते पर वे हिंसक हो उठे। फलत: उनकी दुर्गति हुई। इसीलिए शारीरिक हिंसा कतई न करें। जुबान से ही मन की बात कहें। छोटी छोटी बातों को लेकर गृहस्थी में कांटे न बोएं।

मन को टटोलें

पति-पत्नी क्या चाहते हैं? उनकी खुशी नाखुशी किसमें निहित है, यह जानने का भरसक प्रयत्न करें। यह ज्ञात होने पर उनके सुख दुख का ख्याल रखें। समय समय पर एक दूसरे की सद्च्छिाओं की पूर्ति करते जाएं। परस्पर सुख दुख के सहभागी बनें। एक दूसरे की भावनाओं को जाने समझें।

जीवन एक कला का नाम है। अन्य कलाओं की भांति जीवन को भी उल्लास उमंग से जीने के लिए कठोर साधना एवं तप की नितांत आवश्यकता होती है। इसमें वही दंपति खरे उतरते हैं जो क्रोध में भी जीवन का रस तलाशते हैं।

-वीरेन्द्र कुमार देवांगन

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