क्यों बहकती है नारी?

क्यों बहकती है नारी?

विवाह से पूर्व हर नवयौवना अपने हृदय में अपने प्रियतम के प्रति ढेर सारे सपने संजोये रहती है। उसकी चाह होती है कि उसका पति भी एक फिल्मी हीरो की तरह देखने में सुंदर, सजीला, गठीला और स्मार्ट या जवान हो जो उसे हीरो की तरह बांहों में भरकर उस पर भरपूर प्यार लुटाये। उसकी भावनाओं का आदर करे। उसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक तथा आर्थिक रूप से वे सब कुछ दे जो विवाह से पहले पाना उसके लिये मुमकिन नहीं था।

इन्हीं सुनहरे सपनों को लिये वह ससुराल में कदम रखती है। यदि पति उसके सपनों के अनुरूप निकला तो उसका गृहस्थ जीवन सुखमय होकर खुशियों से भर जाता है किंतु अगर कहीं सब कुछ विपरीत हुआ तो पत्नी के सारे सपने धुएं के समान उड़कर समाप्त हो जाते हैं और जीवन नरक समान लगने लगता है।

पति, पत्नी को अपेक्षित यौन सुख से वंचित रखता है अथवा यौन सुख प्रदान करने में असमर्थ रहता है, फूहड़ समझ कर हंसी उड़ाता है तथा तिरस्कार करता है, व्यर्थ की लड़ाई और तानाशी करके उसके मन मस्तिष्क में जहर भरता है, अपने ही कामों में व्यस्त रहकर पत्नी की उपस्थिति को नजरअंदाज करता है, छोटे छोटे मतभेदों के कारण पत्नी की ओर से मुंह मोड़कर दूसरी स्त्रियों के चक्कर में रहने लगता है, आदि ऐसे कारण हैं जिनसे पत्नी की सुकोमल भावनाएं आहत हो जाती हैं और उसके हृदय में पति के प्रति मान सम्मान समाप्त होकर घृणा और द्वेष की भावनाएं पनपने लगती हैं।

यों तो नारी स्वभाव से सहनशील, सामंजस्य बिठाने वाली तथा क्षम्य भाव वाली होती है लेकिन हठ और प्रतिशोध की भावना भी उसमें कम नहीं होती। पति के जुल्मों का जब वह इस कदर शिकार हो जाती है कि सब कुछ बरदाश्त से बाहर हो जाता है, तब वह प्रतिशोध या क्षतिपूर्ति के लिये परपुरूष के रूप में विकल्प ढूढंने लगती है। इन वैकल्पिक पुरूषों में देवर, भांजा, निकट संबंधी, पति का मित्र, सहकर्मी, बास, सहेली का पति या फिर पड़ोसी तथा सम्पर्क में आने वाले अन्य आकर्षक व्यक्तित्व के लोग हो सकते हैं।

अक्सर यह देखने और सुनने में आता है कि अमुक स्त्री का अमुक पुरूष से शारीरिक संबंध है। फलां स्त्री चार बच्चों की मां होते हुए किसी पड़ोसी या प्रेमी के साथ भाग गई है। लोग आश्चर्य करते हैं कि देखने में तो अमुक स्त्री बड़ी सीधी-साधी पतिव्रता और शरीफ लगती थी परन्तु निकली बड़ी निर्लज्ज और बेहया। मजेदार बात तो यह है कि इस तरह की टीका टिप्पणी करने वालों में स्त्रियां ही सर्वप्रमुख होती हैं।

स्त्रियां इस तथ्य को अपने आप ही स्वीकारती हैं कि स्त्री और पुरूष के आचरण के मापदंड समाज में अलग अलग हैं। किसी पुरूष का दूसरे की स्त्री पर आसक्त हो जाना उतना जग हंसाई का विषय नहीं बनता जितना एक स्त्री के द्वारा परपुरूष से संबंध स्थापित कर लेना है। वह समाज के लोगों की दृष्टि में पतिता, वेश्या, कलंकिनी और न जाने क्या क्या बन जाती है जबकि पुरूष की सामाजिक प्रतिष्ठा ज्यों की त्यों बरकरार रहती है।

पुरूष हो चाहे स्त्री, विवाहित हो या अविवाहित, सभी के दिल के किसी एक कोने में, कहीं न कहीं अपने प्रियतम के प्रति आकर्षण की भावना छिपी रहती है। जब पति पत्नी के संबंधों में रिक्तता भरने लगती है तो प्रियतम के प्रति वह आकर्षण की भावना घृणा में बदल जाती है। गृहस्थ जीवन में शारीरिक मानसिक, आर्थिक और सामाजिक किसी भी तरह की असंतुष्टि चारित्रिक पतन को जन्म दे देती है।

कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें हमारा समाज आज तक भी पचा नहीं पाया। सदियों से पुरूष नारी को भोगता आ रहा है। उसने उसे उपभोग की वस्तु से अधिक नहीं समझा। आज भी इस मनोवृत्ति को छोड़ते हुए उसे तकलीफ हो रही है। पुरूष आज भी अहम् की भावना से पीडि़त है। उसकी यही इच्छा रहती है कि उसकी भार्या उसकी इच्छा के अनुसार ही आचरण करे परंतु आज और बीती परिस्थितियों में जमीन आसमान का अंतर है।

आज स्त्रियां शिक्षित हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं, कैरियर माइंडेड हैं तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं। समाज में, परिवार में, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में स्त्री का समान अस्तित्व स्वीकार किया जा रहा है। जैसे व्यवहार की अपेक्षा पुरूष दूसरों से करता है, वैसा ही व्यवहार उसे स्वयं भी अपनाना चाहिये। नारी को केवल भोग की वस्तु नहीं माना जा सकता। उसकी कामेच्छा को भी अपराध नहीं माना जा सकता। पत्नी पति की सहचरी है, अनुचरी नहीं।

प्राचीन काल में नारी की देह स्वामी की अमानत थी। उसका मन, उसकी अभिव्यक्ति और भावनाएं सभी कुछ पुरूष के पास कैद थे। वह केवल वहीं कहती या करती थी जो पति का हुक्म होता था। सैक्स के लिये भी वह पति की इच्छा पर निर्भर थी।

मनुस्मृति में कहा गया है कि पत्नी के पतिता होने पर पति को अधिकार है कि वह उसके साथ संभोग न करे अर्थात् उसे संभोग सुख से वंचित रखे।

नारी पतिता क्यों हुई, यह किसी ने नहीं सोचा। खैर, समय के साथ अब सारी मान्यताएं दम तोड़ रही हैं।

कुछ पुरूष तो अपने काम-काज को ही सब कुछ मानकर इतने खोये रहते हैं कि पत्नी की इच्छाओं को समझने का उनके पास समय ही नहीं होता।

पत्नी ने कोई शिकायत कर दी तो बदले में मिलती हैं गाली और झिड़की। पति के प्यार भरे बोल सुनने और शारीरिक सुख के लिये वे तरसती रहती हैं। पति की यही विमुखता जब पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तो पत्नी की भावनाएं आहत हो जाती हैं और वह विकल्प ढूंढऩे लगती है। वह अपने आस पास ऐसे प्यार और सहानुभूति को तलाशने लगती है जो पति द्वारा उसे प्राप्त होना संभव नहीं। ऐसी स्थिति में पड़ोसी, पति के मित्र, दफ्तर में सहकर्मी अथवा रिश्तेदार बनावटी सहानुभूति और स्नेह जता कर अपना मतलब साध लेते हैं। नारी समाज की धुरी है। देश और समाज की प्रगति उस पर निर्भर करती है। उसे भी कदम से कदम मिलाकर चलने का अधिकार है। उसकी भी इच्छाएं हैं जिनका सम्मान होना आवश्यक है।

- परशुराम संबल

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